यह अच्छा हुआ
नहीं जीता अंतर्द्वंद
नहीं हैं मार
संवेदनाओ की भीतर
कि विवेक ओर आशक्ति बीच
होता रहे संघर्ष
श्रम तो झूझा
पर अब काबू मे हूँ
सपाट भाता हैं जीना
यह राग संवेदना
नहीं बहता भीतर
उलझन मिटी
स्त्रोत रोका हैं मैंने
अब निश्चित
विवेक जीता हूँ
अपनी क्षमताऐ जानने लगा हूँ
विचारों का
जगमगाता पूञ्ज
रोशनी के कतरे
चारों ओर से प्रकाशित
घेरे हैं मुझे
पहुँच पहुँच हुआ हूँ
ऊँचाई के शिखर
अभ्यास से पार हुआ
संवेदनाओ के जाल से
नहीं होता अब
लाचारो के शोषण का दर्द
विवेक की चिन्गारिया
जलती हुई
उजाडती जाती बस्तियों
गरीबों की
संतोष होता हैं अपने विवेक पर
तर्को का सामर्थ्य
बसाता जाता नये भव्य भवन
चर्चित हुआ बेखटके
घनी आबरू जीता हूँ
अब तुम्ही सोचो
स्मार्ट क्या यूँ ही होंगे
बिना गरीबों को नष्ट किये
विवेकियो का अन्वेषण
हो चुका
मानव सुविधा ऐसे ही आती हैं
मानव की बली पर
दिव्य होने का सपना
विवेक ही करेगा
तुम्हें सीखने होंगे गुर
सभ्यता के
अभी वक्त माहोल बना हैं
मानवता का
आओ जीए तब तक विवेक
जब तक जागरण न हो
आम का
भीतरी सत्य जानने मे
समय मत लगाओ
अंधेरा रहने दो यहाँ
अन्यथा विवेक रस
जल जाएगा
संसार संजोया बनावटी विवेक
मिथ्या करोगे क्या
पागल मत बनो
स्वार्थ रस मीठा
विवेक रस पीओ
निन्द खुलने तक ही सही ।
छगन लाल गर्ग।
नहीं जीता अंतर्द्वंद
नहीं हैं मार
संवेदनाओ की भीतर
कि विवेक ओर आशक्ति बीच
होता रहे संघर्ष
श्रम तो झूझा
पर अब काबू मे हूँ
सपाट भाता हैं जीना
यह राग संवेदना
नहीं बहता भीतर
उलझन मिटी
स्त्रोत रोका हैं मैंने
अब निश्चित
विवेक जीता हूँ
अपनी क्षमताऐ जानने लगा हूँ
विचारों का
जगमगाता पूञ्ज
रोशनी के कतरे
चारों ओर से प्रकाशित
घेरे हैं मुझे
पहुँच पहुँच हुआ हूँ
ऊँचाई के शिखर
अभ्यास से पार हुआ
संवेदनाओ के जाल से
नहीं होता अब
लाचारो के शोषण का दर्द
विवेक की चिन्गारिया
जलती हुई
उजाडती जाती बस्तियों
गरीबों की
संतोष होता हैं अपने विवेक पर
तर्को का सामर्थ्य
बसाता जाता नये भव्य भवन
चर्चित हुआ बेखटके
घनी आबरू जीता हूँ
अब तुम्ही सोचो
स्मार्ट क्या यूँ ही होंगे
बिना गरीबों को नष्ट किये
विवेकियो का अन्वेषण
हो चुका
मानव सुविधा ऐसे ही आती हैं
मानव की बली पर
दिव्य होने का सपना
विवेक ही करेगा
तुम्हें सीखने होंगे गुर
सभ्यता के
अभी वक्त माहोल बना हैं
मानवता का
आओ जीए तब तक विवेक
जब तक जागरण न हो
आम का
भीतरी सत्य जानने मे
समय मत लगाओ
अंधेरा रहने दो यहाँ
अन्यथा विवेक रस
जल जाएगा
संसार संजोया बनावटी विवेक
मिथ्या करोगे क्या
पागल मत बनो
स्वार्थ रस मीठा
विवेक रस पीओ
निन्द खुलने तक ही सही ।
छगन लाल गर्ग।
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