ऊँचा उठा हूँ मैं
निगाहों मे आता कम हूँ
छोटे ओर बौनो की पहुँच से हुआ हूँ पार
हुआ हूँ समय के पंखों पर सवार
उडता हूँ अंतरिक्ष
देता हूँ पहचान
तुम्हारे अस्तित्व की
कितने अविकसित हो तुम
यह उड़ान हम सी
नसीब नहीं तुम्हारे
बलिदान दिये हैं हमने
तभी उठे हैं ऊँचे इतने
ओर हो सके सवार
समय के पंखो पर
ऐसे बलिदान खरीदने होते हैं
खरीद पाओगे तुम
बिकते हैं भारी किमत
चुकानी होती हैं अस्मिता
मानवता का गुमान
बनना होता हैं गुलाम
तभी मिलती हैं असली पहचान
हुआ जाता हैं सवार
समय के पंखो पर
नहीं जरूरत
विवेक या गुणवत्ता
इन्हें केवल शब्दों से कंठस्थ किये
उगलना हैं
यही बलिदान हैं
पृष्ठभूमि हैं यह
इसी योग्यता से तय होता हैं
उड़ान का रास्ता
अब वक्त तो लेगा
सोचना होगा दस बार
प्रयास का बलिदान भी होगा
तलाशने होगे समूह
प्रशंसकों के
सभी तरीके लेने होंगे काम
भीतरी संघर्ष झेलना होगा
संवेदना मिट जाय
समर्पण भी करना होगा
तन मन ओर धन का
तभी पाओगे असली प्रशंसक
तैयार होगी भूमिका
जहाँ से उड़ान ले सको
आज की उड़ान का
असलीपन
शायद इसी रास्ते बिकता हैं ।
छगन लाल गर्ग।
निगाहों मे आता कम हूँ
छोटे ओर बौनो की पहुँच से हुआ हूँ पार
हुआ हूँ समय के पंखों पर सवार
उडता हूँ अंतरिक्ष
देता हूँ पहचान
तुम्हारे अस्तित्व की
कितने अविकसित हो तुम
यह उड़ान हम सी
नसीब नहीं तुम्हारे
बलिदान दिये हैं हमने
तभी उठे हैं ऊँचे इतने
ओर हो सके सवार
समय के पंखो पर
ऐसे बलिदान खरीदने होते हैं
खरीद पाओगे तुम
बिकते हैं भारी किमत
चुकानी होती हैं अस्मिता
मानवता का गुमान
बनना होता हैं गुलाम
तभी मिलती हैं असली पहचान
हुआ जाता हैं सवार
समय के पंखो पर
नहीं जरूरत
विवेक या गुणवत्ता
इन्हें केवल शब्दों से कंठस्थ किये
उगलना हैं
यही बलिदान हैं
पृष्ठभूमि हैं यह
इसी योग्यता से तय होता हैं
उड़ान का रास्ता
अब वक्त तो लेगा
सोचना होगा दस बार
प्रयास का बलिदान भी होगा
तलाशने होगे समूह
प्रशंसकों के
सभी तरीके लेने होंगे काम
भीतरी संघर्ष झेलना होगा
संवेदना मिट जाय
समर्पण भी करना होगा
तन मन ओर धन का
तभी पाओगे असली प्रशंसक
तैयार होगी भूमिका
जहाँ से उड़ान ले सको
आज की उड़ान का
असलीपन
शायद इसी रास्ते बिकता हैं ।
छगन लाल गर्ग।
No comments:
Post a Comment