Tuesday, 22 December 2015

सेवा निवृत्ति ।

सेवा निवृत्ति
हर व्यक्ति का नहीं हक
केवल राजकीय कार्मिक
हो जाता अकाम
जब पाता एक पड़ाव
उम्र का
यह पैमाना
होता हैं निश्चित
सरकारों द्वारा
उनकी सुविधा से
अकथनीय थकान
निवृत्ति का आदेश पाते ही
महसूस करता
उधर सहकर्मी संवेदना मे
करते सतरंगी
एक भव्य आयोजन
ओर कार्मिक
दुखी हृदय होता
सेवा निवृत्त
बड़ा अजीब हैं यह
भाषणों का दौर भी
अमानवीय दैविक गुणों का
अवतार साबित करने मे
लगती जाती
होडा होड़
कि असलियत उसकी
लुप्त होकर बन जाता
उस पल का महापुरुष
यह दिन
शायद उसकी खुशकिस्मती का
होता हैं आखिरी दिन
फिर शुरू होता
एक नया अध्याय
जहां हर दिन
आता हैं रात लिए
बेकाम करेगा क्या
वहीं खटिया
जिसे बड़ी मुश्किल से
निन्द लेने का
अवसर देती
आज वहीं उसकी छाया
संगिनी
यकायक मिला यह जीवन
भीतर से तौडता जाता
बेकाम व्यक्ति
मृत्यु से पूर्व
भीतर की मार मरता रहता
चुभता हैं अब घर
कान्टे की तरह
फिर शुरू होती हैं दीवारें
बेकाम ओर काम की
बेकाम बेकार को
सरकाया जाता
घर के एक कौने मे
वहीं घर
जिसका निर्माण तिल तिल
वेतन से
किस्तो पर किया
आज वह खुद
किस्त का अंश बना
घर का
नकारा सदस्य
आफत से कम कहां ।
छगन लाल गर्ग।





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