आओ संध्या
असीम कालिमा लिए
प्रवेश करो धीरे धीरे
आने दो धुन्धलापन
घर के भीतर
सूर्य की रश्मियो का मद
उतरता जाता
उतरने दो
फैलाओ धुन्धलका
करो अपने काल अंधेरे को साकार
पर मैं बूझने नहीं दूँगा
प्राणों का दीया
लघु अस्तित्व ही सही
अपनी गरिमा देता
जल उठेगा मेरा रोशन दीया
नहीं रखता अपनी ज्वाला
तो क्या हुआ
अस्तित्व क्षमता रखता
जगाता हैं भीतरी रोशनी
नहीं करता प्रखरता का दावा
पर रखता हूँ दम
मिटाता हूँ भीतर का अंधकार
मेरे घर की कालिमा
बाहर के अंधेरे
नहीं डरा पाते मुझे
नही क्षमता
बाहर अंधकार मिटाऊ
तो क्या हुआ
संकेत हूँ मैं
तुम्हारे नाश का
देखते हो रूप मेरा
निखरा सा कंचन सा
जलता हुआ
तुम्हें जलना निखरना कहां आया
फर्क हैं
हम दोनों बीच
साफ साफ़ सतही
मेरा जलना उष्मा बनती
प्राणों की
टिमटिमाना मेरा संघर्ष
तुमसे
रोशनी जिन्दगी हैं मेरी
अंधेरे का खेल कहां
केवल सन्नाटा तुम्हारा
मौत सा
जीवन के लक्षणो से हीन
जड हो तुम
तुम्हारी क्रिया केवल एक
अंधकार
मैं हूँ क्रिया
संघर्ष ओर जीवन का चेतन
हारता कहां मेरा उजाला
आंशिक ही सही
देता हूँ चुनौती तुम्हें
जो करती हैं भयभीत तुम्हें
मैं हूँ
प्रकृति सूर्य का अंश
मानव चेतना का दीपक
मुझसे ही तपीस पाता हैं मानव
मिटाता जाता जीवन का अंधेरा
सूर्य के इन्तजार तक
देखो मेरा संघर्ष
एक काल सीमा के उजाले का बिम्ब
अंधेरे को मिटाते
सूर्य के अंश मे
रूपान्तरित होता हूँ
फर्क हैं ना
मेरे तुम्हारे का।
छगन लाल गर्ग।
असीम कालिमा लिए
प्रवेश करो धीरे धीरे
आने दो धुन्धलापन
घर के भीतर
सूर्य की रश्मियो का मद
उतरता जाता
उतरने दो
फैलाओ धुन्धलका
करो अपने काल अंधेरे को साकार
पर मैं बूझने नहीं दूँगा
प्राणों का दीया
लघु अस्तित्व ही सही
अपनी गरिमा देता
जल उठेगा मेरा रोशन दीया
नहीं रखता अपनी ज्वाला
तो क्या हुआ
अस्तित्व क्षमता रखता
जगाता हैं भीतरी रोशनी
नहीं करता प्रखरता का दावा
पर रखता हूँ दम
मिटाता हूँ भीतर का अंधकार
मेरे घर की कालिमा
बाहर के अंधेरे
नहीं डरा पाते मुझे
नही क्षमता
बाहर अंधकार मिटाऊ
तो क्या हुआ
संकेत हूँ मैं
तुम्हारे नाश का
देखते हो रूप मेरा
निखरा सा कंचन सा
जलता हुआ
तुम्हें जलना निखरना कहां आया
फर्क हैं
हम दोनों बीच
साफ साफ़ सतही
मेरा जलना उष्मा बनती
प्राणों की
टिमटिमाना मेरा संघर्ष
तुमसे
रोशनी जिन्दगी हैं मेरी
अंधेरे का खेल कहां
केवल सन्नाटा तुम्हारा
मौत सा
जीवन के लक्षणो से हीन
जड हो तुम
तुम्हारी क्रिया केवल एक
अंधकार
मैं हूँ क्रिया
संघर्ष ओर जीवन का चेतन
हारता कहां मेरा उजाला
आंशिक ही सही
देता हूँ चुनौती तुम्हें
जो करती हैं भयभीत तुम्हें
मैं हूँ
प्रकृति सूर्य का अंश
मानव चेतना का दीपक
मुझसे ही तपीस पाता हैं मानव
मिटाता जाता जीवन का अंधेरा
सूर्य के इन्तजार तक
देखो मेरा संघर्ष
एक काल सीमा के उजाले का बिम्ब
अंधेरे को मिटाते
सूर्य के अंश मे
रूपान्तरित होता हूँ
फर्क हैं ना
मेरे तुम्हारे का।
छगन लाल गर्ग।
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