Thursday, 17 December 2015

नीरस कान्त काल।

अजीब ऊहापोह छाया हुआ हैं कुण्ठित मन
कुछ हैं क्या हैं क्या नहीं कहो न थोड़ा रे मन
खामोशी हैं बाहर भीतर हलचल मे हैं तडपन
अनेको होंगे कारण दोष किसे दू कहो तो मन।
बवंडरो का जोर हुआ वेगमय
छिप जा रे कहीं तू करूणामय
बच रहा तो ही झेलेगा तनमय
विरह जनित हैं कसक रे हृदय ।
लय से सूनापन पसरता विस्तृत हैं
भय कातर होते अजनबी अपार हैं
क्षय से विपुल सृष्टि सृजन तत्पर हैं
नीरस कान्त काल देता यही संकेत हैं ।
अनजाने भी कब परिचय देंगे
काल थोड़ा कब विस्तार लेंगे
अहंकार छाया क्या मुक्ति लेंगे
शाश्वत किरण क्या चित लेंगे ।
मिले जो अनमिले हो रहे हैं
खिले वे मुरझाते जा रहे हैं
रीते नव रस भरे जा रहे हैं
भरे भार ढो विकल हो रहे हैं ।
सार जग कब कैसे जान पाया
तार वीणा टूटे कब जोड़ पाया
हार जीत भ्रम कोन छोड पाया
डार टूटी पेड़ कोन जोड़ पाया।।
छगन लाल गर्ग।



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