Monday, 21 December 2015

दो ना भुलावा।

दो ना भुलावा
नादान घना हूँ
स्नेह निर्झर मे
नहाया नहीं हूँ
मन चाही लहर कभी
हृदय सागर मे
उमडी नहीं हैं
तन की यह गागर
नित रीती रही हैं
दो ना भुलावा
नादान घना हूँ
मुस्कान तुम्हारी
तडित बन चुभती
रीते हृदय मे
लहर सी हलचल भरती
स्नेह बिना का चित हैं मेरा
हाव भाव से रहा अनजाना
भेद यह पाता
विस्मृति देता
आह मेरे मितवा
कैसा रे जादू
हृदय धरातल
पिघला पिघला
उठ उठ दौडे
कोलाहल  कैसा
गागर चित यह
सागर हुआ कैसे
स्नेह राग अब
बहता जाता
लगने लगा रे
स्नेह सरिता बहती
दो ना भुलावा
नादान घना हूँ
प्रेम कथा यह
गहराई झील सी
सुमन बनी तुम
या अरूण रवि रश्मि
मुख मंडल तेरा
आभा देता
शोभा किरण बन
चित मे रमती
कोमल कोमल
गात पंखुरी
हृदय गगन मे
उषा सी लालिमा भरती
दो ना भुलावा
नादान घना हूँ
प्रियतम मेरे
तुम क्या आये
प्राण प्रेममयी
मदिरा लाये
प्यासा घना चित
कैसे पीये रे
स्पर्श आह मादक
तन होती पुलकन
प्रबल सिराये
स्फूटन लेती
नेह वेग घना रे
प्रियतम मेरे
बाढ हुआ नेह
मुझे बहाता
कर दो ना उपाय
वर्चस्व मेरा तुममे
विलय हो जाय
गंध तुम्हारी
मदभरी नशीली
दे रही मदहोशी
बचना नहीं चाहूँ
देह पीघल कर
नीर बनी अब
सागर हो रसीली
खुद मे समा लो
दो ना भुलावा
नादान घना हूँ
राग उभरा प्रेमिल
भूला रे भूला
विराग काल भी
लौकिक नेह का
यह नजारा
देता जाय
भीतर रश्मि बन
अलौकिक स्नेह का
हल्का किनारा
मीठास जब तेरी
भाती घनेरी
परम स्नेह की
पावन मदिरा
होगी कितनी अनूठी
राह यही रे
प्रेमी मेरे चल चख थोड़ा
संसार हैं जीना
राह फिर जाना
उसी डगर रे
जहां निश्छल प्रेम
गगन कहता हैं
अब दो ना भुलावा
प्रियतम मेरे
नादान घना हूँ ।
छगन लाल गर्ग।







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