Saturday, 19 December 2015

नहीं भाता।

नहीं भाता
 घना अंधकार
डराता जाता
अंधेरे का यथार्थ
अकेलेपन का अहसास
जकडता जाता
संपूर्ण अस्तित्व
शून्यता का विकराल सत्य
बर्बरता से
रौदता हैं बार बार
जीवन के सारे
विवेक का भ्रम
असलियत लिए
काम्पता रहता
नहीं हैं
तर्क ओर चर्चा का सत्य
अंधकार की खोये
अपना वर्चस्व
ओर यह यथार्थ
जीवन का
लगता हैं विभत्स रूप
अंतहीन प्रवृत्ति लिए
यह पल जीत लेना
जीवन की अनुभूति पाना
हर रजनी
 अपने आवरण
मोटे गात मे
नवल प्रभात का सुनहरा
उजियारा लिए
अपनी प्रभुता का
अहंकार
बतलाती जाती हैं
एक महिन
 समय का पर्दा
जीवन के सुख
छिपा देता
तथ्य तो सत्य हैं
पर यह अंधकार
नहीं भाता।
छगन लाल गर्ग।



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