अब आओ ना
प्रेम भरा चित कलश तुम्हारा
रीता पड़ा हैं
हृदय हमारा
भरा स्नेह नीर उथलाओ ना
क्षुब्ध हुआ व्यथा भार से
प्रेमिल छटा अलको की छाया
मधुकर सी अधरो की मदिरा
जी भर कर चखाओ ना
अब आओ ना
पुलकित हृदय कर जाओ ना
डूब रहा रे दर्द सरोवर
रज्जू डोर स्नेह बन
कतरा भर आस
तिनका बनकर
सूने हृदय की तंरग झंकृत हो
बज जाओ ना
करूण शून्य बना
अस्तित्व तुम बिन
कमनीय करो से
संबल समरस स्नेहिल मादक
स्पर्श साकार सहलाओ ना
अब आओ ना
भाव भंगिमा भाती भरती
स्नेह शाश्वत सृजन लेता
चित सागर मे सिरहन देता
मीठी मादक मोह की लहरे
कल्पित कामना बन
कंपन देती
साकार स्नेह का बिम्ब बनकर
नयनो से नेह पवन बनी तुम अइ
चुपके चुपके
चित छायी हो
अब आओ ना
जर्जर जीवन
जाल जकडा रे
समय सिपाही पकड़ रहा रे
घोर घनेरा घेरा डाला
काल कालिमा
घनीभूत घबराऊ
हृदय हारा सा
हहराता जाय
शून्य सृष्टि विसर्जन चाहे
प्राण अटकता
पगडंडी निहारे
अब आओ ना
चित चुराती
स्मृति फिर फिर
निशा निहारती
अपना समझे
निगाह हैं नाशक
यौवन उन्माद लिए
मुग्धा नायिका बन
आलिगंन चाहती
विलय होती रे
मुझमें निर्मम
अब आओ ना
अचेतन आवरण
तन तना तनावमय
कर्मणीय अंग सब
छोडी क्रियाऐ
छलना छा रही
रागिणी ना हो विस्मृत
प्राण रहे तक
स्पंदन रहे तक
आ जाओ ना
नेह निर्झर
बरसा जाओ ना
अब आओ ना।
छगन लाल गर्ग।
प्रेम भरा चित कलश तुम्हारा
रीता पड़ा हैं
हृदय हमारा
भरा स्नेह नीर उथलाओ ना
क्षुब्ध हुआ व्यथा भार से
प्रेमिल छटा अलको की छाया
मधुकर सी अधरो की मदिरा
जी भर कर चखाओ ना
अब आओ ना
पुलकित हृदय कर जाओ ना
डूब रहा रे दर्द सरोवर
रज्जू डोर स्नेह बन
कतरा भर आस
तिनका बनकर
सूने हृदय की तंरग झंकृत हो
बज जाओ ना
करूण शून्य बना
अस्तित्व तुम बिन
कमनीय करो से
संबल समरस स्नेहिल मादक
स्पर्श साकार सहलाओ ना
अब आओ ना
भाव भंगिमा भाती भरती
स्नेह शाश्वत सृजन लेता
चित सागर मे सिरहन देता
मीठी मादक मोह की लहरे
कल्पित कामना बन
कंपन देती
साकार स्नेह का बिम्ब बनकर
नयनो से नेह पवन बनी तुम अइ
चुपके चुपके
चित छायी हो
अब आओ ना
जर्जर जीवन
जाल जकडा रे
समय सिपाही पकड़ रहा रे
घोर घनेरा घेरा डाला
काल कालिमा
घनीभूत घबराऊ
हृदय हारा सा
हहराता जाय
शून्य सृष्टि विसर्जन चाहे
प्राण अटकता
पगडंडी निहारे
अब आओ ना
चित चुराती
स्मृति फिर फिर
निशा निहारती
अपना समझे
निगाह हैं नाशक
यौवन उन्माद लिए
मुग्धा नायिका बन
आलिगंन चाहती
विलय होती रे
मुझमें निर्मम
अब आओ ना
अचेतन आवरण
तन तना तनावमय
कर्मणीय अंग सब
छोडी क्रियाऐ
छलना छा रही
रागिणी ना हो विस्मृत
प्राण रहे तक
स्पंदन रहे तक
आ जाओ ना
नेह निर्झर
बरसा जाओ ना
अब आओ ना।
छगन लाल गर्ग।
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