Friday, 30 October 2015

बताता नहीं ।

बताता नहीं अगर दिल मानता
बस तन्हाई नसीब तोहफा ही
शब्द दिये सब्र करता
उलझा सा
भ्रम रचित अस्तित्व मेरा
उथलापन पाने आकुल
ग्रसित हुआ जटिलताओ से
कि चमत्कार बनू
गहराई का अंधा कुआ
झाके कोई थाह ले मेरी
उलझे व्यक्तित्व की
रूके थोड़ा चलते चलते
देखें मुझे
कि गहरा अथाह पर अस्पष्ट
करिश्मा हैं अहसास करें
फिर आगे बढ़े
मिलना कहां से हो
फासला विशाल अपार
जीना साधारण कहां मेरा
मनन चिन्तन तिकडम
आधुनिक जीता हूँ
इतराता अपने पर
नये नये शब्द लडिया गूथता जाता
तिकडम भिडाता
लाता किसी शायर की शब्द लडियो के तार
किसी कवि के अछुऐ सपनो की मीठास
निहाल हुआ सा
तिकडम से बन जाता भौपू औरो का
उसे तोड़ मरोड पिरो देता
अपनी कविता तार लय से
शब्दों की सुरिली बाँसूरी सुनाता जाता
मदहौश ना हो आप
रूकना तो पड़ेगा घड़ी दो घड़ी
बस इतना काफी मेरे लिए
यह जटिल जीवन
किसी ओर की बख्शीश नहीं
स्वयं चुना हैं मैंने
कहने को हो
जीवन सरल कहां
जटिल हैं घना
आपके हमारे सुलझाये
ओर उलझता
ओर अथाह अंधा कुआ बन जाता
या कि बना देता मैं
कि जिन्दगी उसमें ढूँढते ना मिले ।
छगन लाल गर्ग।

बताता नहीं ।

बताता नहीं ।


छुआ कहां तुमने ।

छुआ कहां तुमने
बिखरे बिखरे से मेरे मन
अंश तुम्हारा धूमिल हुआ
गहरे विषाद से
भाग भाग आसरा चाहो ओरो का
बिखरना तुम्हारा
बेहोशी देता हैं
गहरे तल से
जहाँ चेतना के दीये जलते
कभी टिमटिमाते से लगते
देखते हो तुम मेरे मन
थोड़ी दृष्टि भीतर तो करो
शायद विषाद तुम्हारा रोशनी पाये
ओरो की आस खरी उतरे
कैसे मानू
बिखर बिखर मिटता जाता
बिम्ब तुम्हारा
घने दर्द को क्या
छुआ कहां तुमने।
छगन लाल गर्ग।

अगर मैं कहता।

न जाने कैसे जी लेते हो इतना झूठ
पग पग पर तुम्हारा यह रूप देख मैं बौना हो जाता हूँ
तुम्हारे सामने क्या गजब की कला रखते
मंत्र मुग्ध कर देते तुम बडे पारखी हो जीवन कला के
कहां निराश करते तुम किसी को
आश्वासन तुम्हारा नया जीवन देता हैं चाहे बुनियाद कुछ भी हो
चाहे तुम वोट माँगने जाओ चाहे तुम व्यवसाय करो
कहीं नोकरी हो या घर मे बीबी की फरमाइश हो
भाई गजब हैं तुम्हारा झूठ अनुभव  नमन हो
बाहर बाहर कितने सुंदर तुम ओर तुम्हारे विचार
कभी अंदर कुछ बोलता तुम्हें या भीतर का रावण पूरा घेरे हैं तुम्हें
कि कहीं गुंजाइश रही नही मानवीय कोमल भावों  की
दाद देता हूँ विवश हूँ तुम्हारे इस रूप का प्रतिकार करने मे
मैं जानता अपनी औकात आज की सच्चाई की तरह
अगर मैं कहता हूँ सच्चाई तुम्हारी कौन सच्चाई मानता हैं
सच्चाई को प्रमाणित होना होता हैं तभी मान्य हैं
तुम्हारे झुंठ को क्या प्रमाण चाहिए किसकी हिम्मत हैं कि प्रमाण चाहे
अब अगर मैं कहता हूँ तो चोरी छिपे सामना तुम्हारा करना
मेरी हैशियत नहीं ।
छगन  लाल गर्ग।

Thursday, 29 October 2015

संभावनाएँ छलती हैं ।






अजीब कसमकस जीता हूँ जिन्दगी तुझे
उतार चढ़ाव का हिछोला बना हूँ तेरा
कभी ऊँचा उठा पाता एक झलक ही पलभर की ऊँचाई
कि तुरंत बिना पल गवाये नीचे कौतुहल देती तुम
धरातल से ऊँचा महीन डोर टीका अस्तित्व मेरा
कभी ऊपर धक्का खाये उठता
स्वयं की शक्ति से अछुआ बढता उपर जीवन
टीके भी कैसे हवा मे पर बार का धक्का ऊँचाई देता हैं
पराये आसरे ऊपर उठना आज की सच्चाई हैं
स्वयं की योग्यता का दौर नहीं रहा
कि परख हो सक्षमता की
खुद के पैरो से लगा ऊँचाई का धक्का अधिक भरोसा हैं
ऊंचा उठने का समत्ता सामर्थ्य का
पर देखता नये युग के सत्य स्वार्थ जीते परिमार्जित हुए जीते हैं
सक्षम हारे हताश हुए हैं
अवसर की ताक मे होनहार संभावनाएँ पाले हैं
पर हर बार योग्यता को धता बताये तिकडम कारगार हुआ हैं
मेहनती युवाओं को सभ्य युग की संभावनाऐ छलती हैं ।
छगन लाल गर्ग।

जीवन तुम अनुभूति हो।

जीवन तुम हो एक अनुभूति हो
जिसे मैं महसूस करता प्रतिदिन स्पन्दन देते हो
लेता तभी तभी मैं  गति तुम्हें महसूस करता
धड़कने धक् धक् करती सी ओर मैं सोचता चलती हो तुम
ओर मैं महसूस करता अपना जीना नाम देता जिन्दगी
फिर चलता फिरता मरजी का जहाँ मन हो निकल जाता
फिर बोलता भी हूँ कभी सार्थक अर्थ समझती दुनिया
कभी निरर्थक जिसका अर्थ महसूस होता केवल मुझे
थोड़ा सा अर्द्ध ही हाँ आधा पूरा कहां समझ पाया मैं
पर बोलता हूँ मैं मिलता क्या मुझे बोलते
कभी मीठास जिसे चाहा मैंने
कभी ताना जो सुनना कब अच्छा लगा मुझे
कभी तीखी प्रतिक्रिया मात्र जिसे कभी नहीं चाहा
पर यह सारा कुछ ऐसे ही थोड़े ही हुआ
जब कोई कहता कि विद्वान तुम पढ़ें लिखे अच्छे संस्कृत
कितना भाता काश ।ऐसा सुनना मिलता रहे
पर हर बार किसके पड़ी हैं बेवजह तारिफ कभी हुई किसी की
अरे बड़े बड़े गला फाड चिल्लाये तब सुना लोगों ने
अपनी हैसियत तो देखो अदने से
कभी खुद को देखा ठीक से खुद को
तुम देखते दुसरो को देखो खुद को पता लगे कितनी सुनते अपनी
अपेक्षाऐ तुम्हारी अपने से नही दुसरो से हैं
तुम पूरे ठीक कसर हर किसी दुसरे मे हैं
इतना जाना कि तेरा एक ओर रूप भी हैं महत्वपूर्ण
जब होते अकेले विरान एकागी तब भयभीत होते हो अपने आप से
सुनापन बोध देता सा कहता सा
बताओ अपना एक काम किया ओर भूले हो खुद को
ओर हुए एकराग एकरस एकदर्द एकतन कि मैं का कहीं अस्तित्व न हो
ओर तुम भूले हो अपनी चेतना अपना जीवन मिटे मिटे से कि न मैं हूँ न तू हैं
न जग हैं न पृथ्वी न आकाश ना ब्रह्माण्ड का नामोनिशान
जहाँ कोई पद चिन्ह अपना पराया न हो यह दशा
जीवन मेरे क्या पाई कभी या कि होती हैं
होती हैं कब नहीं तो यह सोच क्या क्यों  क्या चुप ही रहेगा
अनभिज्ञ बना दंभ जीता मात्र
विविक ज्ञान दर्शन चेतना प्रज्ञा विज्ञान नहीं पता कितने नाम देता तू
बडे अलौकिक अंलकारिक अब कहना भी क्या तेरा
समझदार बन चुप्पी साधता बुद्ध बना
शायदवाद गढता हूँ ।
छगन लाल गर्ग।

जीवन तुम अनुभूति हो।


Wednesday, 28 October 2015

सपाट चौराहा ।

रास्ते मंजिल के निर्धारण हैं
अक्सर भूल से बचते हैं हम
ओर पाते निर्धारित मंजिल
भटकाव नहीं रहा यात्री निश्चित हैं
रास्ते जानता हैं अपने
जहाँ पहुँचना मकसद उसका
फिर व्यवस्था भी हैं बसों की निश्चित जगह पाने को
कहीं परेशानी हैं क्या
शायद नहीं भीड़ को छोड़ कर
पर ऊपर नीचे जैसे तैसे सफर चलता अंजाम तक
सतही तौर पर सुचारु आवागमन
चौराहे का अगर कोई ठौर हैं तो
मात्र त्रासदी झेलता बेरोजगार
जिसकी सारी मंजिले ढह गई हैं
न कोई रास्ता किसी मंजिल का हैं न निर्माणा धीन हैं
न बस हैं न रास्ता निगाहो के सामने बीहड घना
जहाँ जोखिम जिन्दगी हर रोज घने बीहड मे गुम होती हैं
चौराहे बसे व यात्री भी पर चौराहा यह सपाट हुआ हैं
बेरोजगारो के लिए जिनकी न किसी को परवाह
ओर न बेरोजगारो मे चेतना
कि जल उठे चिगारी बन काम पाना अधिकार मेरा
समझे संघर्ष करे।

Tuesday, 27 October 2015

टूटे बिखरे लोग ।

हाँ यही पहचान ओर होगी क्या
यही कि बस जीते हैं
सुबह शाम का एक ही रंग एक ही आकार
तब्दीली की बात बेमानी हैं इनके लिए
वही कचरे के ढेर पर रैगती जिन्दगी
लकड़ी का सहारा पाये पुराने फैके टाट के कट्टो से गंदगी समाया झोपडा
यही बस यही पूँजी पायी बाप दादो व समाज सरकार से
गहरी उपेक्षा अस्पर्शता ओर घृणा यही जागीरी इनकी
रोते चिल्लाते बच्चे मेरे मर्म को छूते हैं निकलता हूँ पास से
क्या कसूर हैं इनका जिनके माँ बाप रहते भोगते हैं भारी यंत्रणा
ना शिक्षा ना कोई सुविधा ना कोई हमदर्द
मालिक मेरे क्या तू हैं कहीं
यदि हाँ तो दे संवेदना हमारे समाज व शासकों को
यदि मानव हैं तो अपनी इस मानव जाति पर भी
हल्की सी सहृदय दृष्टि हो जिसे छिन पुष्ट हुई मानवता हमारी ।
छगन लाल गर्ग।

Monday, 26 October 2015

फिर एक बार।

पिडलियो की दुखती तंरग नीचे पहुँच बाधक बनी हैं
चलने मे
निश्वास लेता बैठता हूँ सड़क किनारे बनी मुडेर पर
झनझनाहट महसूसता हूँ तन ओर मन मे
हिलता हुआ लगता मानव संघर्ष की तरह
धूप गहराती जाती हैं पर धूप की प्रखरता से अधिक
 विचारों की धूप प्रखरता से तपन देती हैं
चौकता हूँ आवाज सचेत करती हुई
युवा दुखते पैरो पर झुका हैं
हाँ ।पहचाना चेहरा दस वर्ष पहले का शिष्य मेरा
उदास गमगीन थका थका सा टुटा टुटा सा बल लगा मुस्काता हुआ
सर।नहीं पहचाना मैं विवेक आपका स्टुडेन्ट
कैसे हो कहां हो क्या करते हो
प्रश्नो की बौछार से चेहरे की क्षणिक प्रसन्नता लुप्त होती पाता हूँ
बेरोजगार हूँ सर थका हारा जबाव
दस साल हुए सर हर बार नकारा गया हूँ
टयूशन क्लाशेज फार्मस परीक्षा मे बर्बाद हूँ
बीबी बच्चे ससुराल ही रहते हैं
नोट्स लेने शहर आया था लेक्चर की वेकेन्सी आई हैं
हौसला देता हूँ मैं ठीक वहीं स्टाईल जो क्लास मे होती थी
शिष्य चल देता हैं मेरे पिण्डली का दर्द विलय होता सा
युवाओं की विवशता मे समा जाता हैं
सोचता हूँ हर बार बोर्ड मे अच्छे रहे लडके जिन्दगी मे पीछे क्यों
परीक्षा परिणाम बाद भी नोकरी क्यों नहीं
इस नयी पौध का भावी क्या गर्त धकेला जाता हैं
दर्द नाईलाज हैं  ठीक मेरे पिडली दर्द की तरह।
छगन लाल गर्ग।

Sunday, 25 October 2015

नेह नीर नहाया नहीं ।

भरे नेह भंवर भार हृदय तेरे
घने विवर विडोलित पवन पछारे
मौन मनन मूक मंथर मस्तिष्क मंथन मन मित करे
नेह उन्माद अति तीव्र हलचल मचलती कमनीय राग झरे
शब्द नहीं रे स्वर सा लय विलय सृष्टि समष्टि बन अंग रौमाच भरे
आह।यह मुख मादक चितवन तंरग मदन मार मरे
खिलती नवल कली हास्य अलौकिक चित अर्पित करे
अब अवलम्ब अधर राग अमंद रस पान केवल मन भरे
मलयज गंध मस्तिष्क मन हिलोर अति अस्तित्व हरे
पल नहीं रे जीवन सम्पूर्ण मेरा बस यही नहीं अवशेष हैं नहीं
रे जीवन कह तू जिया घनेरा क्या कभी ऐसे  नेह नीर नहाया नहीं ।
छगन लाल गर्ग।

अज्ञात हूँ पथिक।

नहीं हैं दिशा बोध पर राह चलता हूँ
देखा देखी भीड़ के निरन्तर आने जाने से हौसला पाता हूँ
ओर थके कदमों सामर्थ्य से ऊपर बल लगाता बढता हूँ
दिशा हीन गंतव्य तलाशी शायद सार पाऊ थोड़ा सा
एक अर्थ जो मेरा अपना महसूस करू कि तलाश पायी
उपर चलता हूँ नीचे नदी की शिथिल धारा बहती देखता हूँ
निरन्तर गतिशील मंद मंद अलसायी सी
कितनी चल पायेगी समय जाने ठीक मेरी तरह
पूल के किनारे नुकिले हैं पर थकान ओर विश्राम की चाह बैठता हूँ
उनकी चुभती धार पर
मेरे जीवन की ठीक यही सच्चाई नौक पर ठहरी जिन्दगी
मेरी गति से मेल खाता नदी का बहाव
ओर अज्ञात गति एकरसता पाता हूँ बहाव गति ओर तरलता मे
ठीक नदी सा
मैं अज्ञात हूँ पथिक।
छगन लाल गर्ग।


Saturday, 24 October 2015

अनन्त यात्रा

यह पुलिया नदी से उपर उठा मुझे अवसर देता
कि बिना संघर्ष पानी नदी पार करू
किनारा पाये आगे बढू मंजिल की ओर
निगाहे उठा देखता हूँ गहराई ओर विस्तार पाया बहता नीर
बढता जाता गतिमय मंजिल की ओर
बेबाध हैं देखता हूँ भागता हुआ अभी अभी
समय ओर सभ्यता सुनता हूँ बाधक होती उसके सपनो मे
प्रखर ताप सोखता जाता जीवन उसका
ओर इन्सान रोकता जाता अपनी गरज बान्ध बनाकर
अंश ही पाता मंजिल सागर विलय
फिर देखता मेरा जीवन मोहताज बना ओरो का पग पग सरकता ऐ

Friday, 23 October 2015

देते रहो तपन मेरे ।

स्मृति अब भार भारी
 विकल हूँ अतिधार तेरी
प्राण पीघल तपन तार होकर
 घुल पीडा की राख काली
पवन बन तप्त जहान करती
चेतना शिथिल होकर
 प्राण रहते निष्प्राण करती
बस कर रे नेह अब तू
कसक बीच जीवन सार कह तू
नीरव राग भी कलंकित होता
 अवसाद मिलता अंधकार आता
जग सुख का अब सार थोथा
नेह का ही कसक पीर भाया
ताप रे मनमीत मुझको
वेदना ही अब सार देती
झेल पीडा कसक तेरी निखरते अब प्राण मेरे
बन चुका रे प्रेम भी अब
निखर निखर पावन हुआ कंचन
नेह बना अहोभाव अब तो प्रार्थना के राग देता
मिलन का अब क्या करू प्रिय देते रहो तपन मेरे ।
छगन लाल गर्ग।


जलना रोशनी हैं ।

अचानक नहीं होता
तपन झेले बिना नीर आये
वह नीर जो ताप उष्मा से परिणाम
पाया हो
ठहरे तन को ठंडा करता
अलग अहसास दिये
तस्सली पाता मन
उर्जा पाकर चेतन होता
प्रखर ताप तब आमन्त्रित करता
फिर फिर तपने को
कि सार बन जाता जीवन
पग पग गाता जीवन
ताप की उर्जा
अब जलना भी रोशनी हैं ।
छगन लाल गर्ग।

अब ठीक हैं ।

थोड़ी तस्सली लगती हैं
कुछ ठीक महसूस करता हूँ
अच्छा रहा
कद्र मिली बुलाया तो हैं
चाहे व्यवसायिक इस्तेमाल ही क्यों न हो
ऑफिस अलग की हैं बेटे ने
रीडर से लेकर मजिस्ट्रेट तक
आदर देते हैं
बडे आत्मीय मिले
बताते हैं
सुबह से वकील साहब से पूछते हैं
आपका
कहां हैं फादर
मैं उतर ढूँढ ता हूँ
कैसे कहूँ कि मुझे कहा तक नहीं
अब वजह मुझे नहीं ढूँढनी पडी
बेटे ने बताया
मोबाइल बीजी था पप्पा का
संतुलित होता हूँ मैं
सोचता हूँ
रक्तिल रिश्तों की गहराई
अब मात्र बनावट
फिर भी अच्छा लगता हैं
चलो।अब ठीक हैं ।
छगन लाल गर्ग।

Thursday, 15 October 2015

सपने थके अब मेरे ।

सपने थके हैं मेरे
गहन चेतना के छीटे
गिरे हैं अभी
भिगा सा झुंझलाया सा
असंतुलित जगा हूँ मैं
लावण्य मदभरा हृदय
इस पल टूट बिखरा सा हैं
कतरे कतरे धुन्ध
रश्मि खोयी सी हैं
भरे भरे लम्हे
करूण किरनो संग
क्षुब्ध तंरगो मिल
स्तब्ध हैं
व्यथा गागर
छिद्र पाता बहा भी हैं
प्रिय मत आओ
डोर रश्मि
परमाणु हल्का
नेह लिपटा
अन्तराल गहरा
गर्त गहरे डूबना भी हैं
गात कोमल भाव गहरे
कामना राह हैं दुर्गम
विरह तन जल
धुआँ  घना हैं
नीर नैनो भरा घना हैं
रोशनी नहीं काम आती
काजल कालिमा
बन बहा नहीं हैं
मिलन शब्द लब आये कैसे
सपने मेरे
थक गये हैं
पुलक अब तो एक बाकी
देह ले विश्राम बाकी
प्राण नेह मिल संग हो ले
दिव्यता का रस पी ले
नद नीर प्रवाह ले ले
गहन नेह विश्राम कर ले
शिथिल जीवन
सार पा ले
देख रे अब रात गहरी
टिमटिमाता दीप तार बाकी
जोड रश्मि लौ बुझे तक
नेह दे पुकार जब तक
लम्हे समझ ले प्राण तू अब
चेतना का राग ले अब
भर दे रीते भाव तू अब
रहा वेदना का गान अब तो
गा विरह का गान फिर फिर
सपने थक गये हैं मेरे ।
छगन लाल गर्ग।



Tuesday, 13 October 2015

राग चेतन रहो।

राग चेतन रहो
खण्डित अस्तित्व सच हैं
यह कसक भीतरी
बाहर मत लाओ
आस्था जीवन
फासला असीम घना
सामर्थ्य बटोरते जियो
विराग राग की दशा
तहो पड़ी हैं
उतरो भीतर
कहीं होगा कतरा रश्मि
पैनी धार दो
प्राण राग घनीभूत होने दो
ढूँढो क्षण
कोलाहल भीतरी
बिना प्रयास
शान्त होने दो
रूको धैर्य मत जाने दो
आने दो
रश्मि कतरा आता हैं
पकडने की जिद्द छोडो
स्वतः प्रवेश होने दो
काफी हैं
क्षणिक ही यह
तम भीगा जीवन
पल को ही
रश्मि कतरे नहाने दो
खण्डित जीवन मेरा
निष्प्राण ही हो जाने दो
अनजाना स्वर उभरता
भीतर भीतर
उभरने दो
शिथिल होते स्वीकारो उसे
स्वीकृति यही
चेतन रूप लेती
आस्था पाती फिर फिर
उर्जा तुम्हारी
मत जाने दो
चेतना आ जाने दो।
छगन लाल गर्ग।

Monday, 12 October 2015

जैसा हूँ रहने दो।

रहा नहीं जाता अब
कह ही दू
भीतर भार बढ़ता हैं
जैसा हूँ वैसा ही रहने दो
मेरे व्यक्तित्व की
ऐचतान मत करो
तुम भरना चाहते
मुझे
अपार गुणों से
पर क्या यह ठीक होगा
स्वाभाविकता मेरी
झुठलाओगे कैसे
सम्भव नहीं मित्र मेरे
विजातिय भाव
कैसे पायेगे भीतर स्थान
केवल ऊपर ऊपर
अपनाना बनावट होगी
स्वाभाविक ही रहने दो
प्रयोजन जीवन
यह तो नहीं मित्र
मैं जैसा हूँ काफी हूँ
उल्टा सीधा करते मुझे
यह अर्थ हीन हैं
ओर उलझ जाऊँगा मैं
क्यों उलझाते हो
म्रमित हुआ
स्वत्व खोये
कैसे जी पाऊगा मैं
रहने दो यह बनावट
सीख बनावट तुम्हारी
जीवन नद को
गंदला कर देगी
अभी नद नीर गंदला
हैं कहां
स्वच्छ हैं प्रकृति
गंदे पेर न सही तुम्हारे
साफ पैरो से भी
मेरे जीवन की
नद धारा मे
मत घुसो
पैरो की हलचल मात्र
मेरे स्वच्छ नीर को
गंदला कर ही देगी
जैसे वासना का उफान
चित आते ही
गंदा कर जाता हैं
ठहरो थोड़ा सा
तुम आये चलो माना
अब नाता तोडो
मूल शात्विक स्वभाव
रहने दो
वास्तविकता हैं यह
बाकी धुन्ध बनावट की
बिना प्रयास छंटने दो।
छगन लाल गर्ग।

सरकारी नोकरी हैं ।

मित्र कहो तो
हम साथ हो ले
मुझे स्कूल छोडते जाना
मित्र अचकचाये
कुछ सोचा तो बोले
रास्ते रूकूगा
थोड़ा काम याद आया हैं
टाइम लेगा
तुम ड्यूटी अपनी
समय पर जा न सकोगे
मेरे तो चलता हैं
हैड मास्टर डरता हैं
एम एल ए अपने हैं
मैं विवस
शायद आज
अवकाश कटेगा
माफ करना
लैट वैसे ही था
रात भर जागा हूँ
पुत्री का प्रसव
ऑपरेशन कराना पड़ा
निन्द कहां ले पाया
बस चूका हूँ
छुट्टी अर्जी वही लिखी
मित्र से बोला
इसे तो ले जाओ
स्कूल जाते बच्चे को
स्कूल बाहर से ही
पकड़ा देना
अनमने से हाथ बढ़ा उनका
किक स्कूटर दे रवाना हुए
मित्र सरकारी शिक्षक हैं
ड्यूटी जाते हैं
मेरी स्कूल से थोड़ी दूर
उसी रूट ड्यूटी हैं
निजी काम निपटाये बिना
स्कूल कैसे जाये
अब हो क्या
पहुँच वाले
फिर सरकारी नौकरी हैं ।
छगनलाल गर्ग।


Sunday, 11 October 2015

छाया तेरी ।

तेरे हरे भरे पते
घनी छाया के पूण्ज
आज  नहीं हैं
मेरे स्वीकृति से
काटे गये
कसूर तेरा इतना सा
कि पक्के पते तेरे
आगन भरते
कचरा बन जाते
सार हीन
गन्दगी का अम्बार बने बने
पैरों तले कूचले जाते
ओर शिकायते लाते
पड़ोसियों की
आपके पते उड उड आते
गन्दला करते नित
हमारा ऑगन
उधर पत्नी का ताना
सफाई का बहाना
नित का झमेला रहता
नीम मुझे निर्मम मत कहना
विवश था मैं
आज तुम रूप हीन
शोभा हीन बने
तो कारण मात्र मैं ही
मैं ही हूँ
सारे एहसास भूला सा
मतलबी हूँ मैं
भीषण धूप के
साथी मेरे
तेरी छाया तले
कितना शुकून पाया मैंने
खुद प्रखर धूप झेल
तू ठंडक देता रहा मुझे
ओर मैं
भीषण कुल्हाडी की धार से
खुली ऑखो से
प्रहार
कितना क्रूर बना हैं मेरा व्यक्तित्व
अभी अभी देखा एक बार
इस रूप तुझे
कहां शिकायत तेरी
खण्डित हुआ भी
तेरी वहीं मुस्कान
दर्द नहीं सालता तुझे
पत्नी ने तेरी कटी लकडियो का ढेर
सलिके जमाया हैं
यह कहते
घने जाडे मे आग जला
ठंडी हटायेगे
ओर पते
मच्छरो से बचने
रोज आग जलते
धुआँ बन सारे माहोल को
मच्छरो विहीन करते
मेरे आधार सुख
तुम फिर पल्लवित होना
इसी तरह
छाया बनना
जीवन की मेरे
काश।मानव
तेरे इस बलिदान से कुछ
सिख लेता
अंश मात्र ही
तो यह जग जीवन
पारस्परिक छाया से
कितना सुंदर
कितना हमदर्द
कितना त्यागी
मानव बन जाता ।
छगन लाल गर्ग।


प्रेमी चला गया ।

कई चाँद अंधेरे को
 रोशन किये
ओर चले गये
कई सूरज उगे
ओर डूबे
प्रेमी ने कब
फिकर की मेरी
मैं अनन्त मे
ऑखे उठाये मेरे प्रेमी
नित निहारू तुझे
चमकते तारो बीच
अंधेरे को चिरती चाँदनी
की छितराई आभा बीच
भ्रम घनीभूत हुआ
आकार पाता तुम्हारा
हाँ ।तुम्ही तुम्ही
ऑसूओ की सघनता बीच
कभी कभार खो खो जाते तुम
भ्रम धोखा दे जाता
फिर कहां दिखते तुम
गर्म आह ले ले
बार बार बुलाता जाता
पर तुम सुनो तब ना
प्रेमी मेरे
फिकर कहां तुम्हें मेरी
दस्तक तो दिल मे
देते तुम हर पल
छाया ही तुम्हारा
झलक तो दो मुझे
शायद सहारा बना सकू
जीने लायक
दिल का घर मेरा
संकरा घना हैं
तेरे रहते
हालाँकि तुम अप्रकट आते हो
पर रहते यही
ओरो को बसाऊ कहाँ
मेरा तुम्हारा
यह भीतरी राग
मिटे भी तो कैसे
तुम हो
छिपे छिपे आते हो
परदा रखते तुम
सबसे
घूघट का परदा
दुनिया नहीं देखती
ओर ऐतबार करती
मेरे अकेलेपन का
पर हूँ क्या अकेले
ख्यालो मे कहां
छोडते मुझे अकेला
अब ओरो का क्या हो
सोचे कि मेरा
प्रेमी चला गया।
छगन लाल गर्ग।






Saturday, 10 October 2015

सिमटती छाया।

सिमटती छाया
नीम की मूल का घेरा
तने के एक तरफा आ गया हैं
हाँ फैलाव का कम होना
सघनता देता हैं
सरकता हूँ
तने की ओर
जडे बाहर उभरी हैं
ऊँची जड बैठक बनी हैं मेरी
अब ठीक
साँस छूटती हैं मेरी
निश्छल एकाग्र हुआ
मंदिर दर्शनार्थियो की आस्था
निहारता हूँ
भीड़ रहती हैं
शनिवार हनुमान जी
का दिन हैं
मैं मन ही मन
पुनः श्रृद्धा भक्ति से
नमन करने लगता हूँ
छाया घटती जाती हैं
मैं उसके ओर करीब
तने से सट गया हूँ
पर कब तक बैठ पाऊगा
सोचता हूँ
मंथन भीतर को छूता हैं
यह जीवन
ठीक ऐसे ही
सिमटी छाया बना हैं
उतरार्द्ध जीवन मेरा
ओर ठीक इसी तरह
छाया बना सिमट रहा हैं
प्रखर धूप
तन सेकने लगी हैं
मंदिर की तरफ देखता हूँ
आध्यात्मिक ऊर्जा
अनुभव करता करता
उठ जाता हूँ
वहीं से दण्डवत नमन
कर कड़ी धूप  सहेजे
छाया की चाह मे
बढता हूँ  आगे
मेरे सृजक
छाया धूप के इस तेरे
खेल मे
मैं अब हारा पात्र हूँ
अभिनय खूब हुआ
तन ओर मन
विश्रान्ति की शीतल
बयार चाहे
जहाँ केवल मैं
ओर तू रहे
प्राण राग जुड़े
महाराग मे विलय
हो जाय।
छगन लाल गर्ग।

सिमटती छाया
नीम की मूल का घेरा
तने 

दीया खाली हैं ।

दीया खाली हैं
दावा नहीं मेरा कि
भीतर उजाले हैं
झकझोरता उफान सा
बूझते अस्तित्व सा
टिमटिमा रहा हूँ
दीया खाली हैं
जलता तो रहा
पर बूझा बूझा सा
भावना हीन
सार्थक कहां रहा जलना
प्रकाश कहां पाया
फिर भी इतराता
हवा की लहर बनकर
कभी ऊँचा
कभी उठने की शेष्टा मे नीचा
जो हूँ  नहीं
वहीं दिखाता
दीया खाली हैं भीतर
दावा नहीं मेरा कि
समाधिस्थ हूँ मै
या कि वीतरागी हूँ
भीतरी तंरगो का खेल
मेरा जीवन
विषम हुआ प्रश्न जीवन
दीया खाली भीतर
टिमटिमाता रोशनी भर
दावा मेरा इतना मात्र
हूँ अभी तो
मौजूद हूँ ।

छगनलाल गर्ग।

Friday, 9 October 2015

समय तुम बेबूझ हो।

अबूझ जीवन
ओर अबूझ अस्तित्व
बिहड अवरोध लिए
समय
तुझे भोगता हूँ
आगत विगत का
न कोई लेखा
न कोई मेरा हिस्सा
कि कह सकू
यह मैने किया
किस प्रेरणा
किस आसरे मैं
मेरा अस्तित्व बना
या कि बिगडा
प्रमाण क्या दू
यह आगे पिछे जो भी
होगा या हुआ
बीच मे मैं कहां हूँ
जो भी हूँ
तेरा निर्मित
हाँ ।साधन रहा
पर मेरा साध्य तू रहा
बडे नजदीकी रिस्ते रहे हमारे
पर कहां परिचय पाया मैंने
तुम्हारा
मेरे साथ पक्ष विपक्ष का
खेल खेलते रहे
पर इस खेल
केवल तुम जितते रहे
नाचता रहा मैं
जैसा तुम नचाते
जब कभी थाह लेना चाहता
तुम झटकते रहे मुझे
करारी चौट पड़ती तुम्हारी
कि तन मन का जर्रा जर्रा
घने दर्द डूब जाता
टूटी पसलियो से
करवट लेता कैसे
निन्द लेता कैसे
जब से हारे मन स्वीकारा हैं तुम्हें
समय तुम जैसे भी रहे
केवल मौन स्वीकृति तुम्हारे साथ
टोह नहीं लेता तुम्हारी
जी लेता हूँ जैसा तुम चाहो
ठावस पाया अस्तित्व
जाना समझा
समय तुम बेबूझ हो।
छगन लाल गर्ग।

Thursday, 8 October 2015

अजनबी हूँ मैं ।

अब कहना
विवशता हैं मेरी
एक बादलो की परत हटी हैं
आच्छादित धुँध का फैलाव
भौथरा गया हैं
विलुप्त रश्मियो का बिखराव
जड जंगम को नहाता
मुझ तक पहुँचा हैं
प्राण तंरगे
रश्मि तंरगो से
अवगुण्ठित होती
कंपित सा हैं अस्तित्व मेरा
तल जमा भीतर
भाव जली धूमिल कालिमा
सरकती सी महसूस करता हूँ
अदृश्य सी
विलोपित होती होती
चेतन प्राण
कसक देते हैं
उजास का भीतरी चेहरा
बिम्ब बना दोहराता हैं
मुझे
स्नेह घेरा तन मन बाँधने
लगता हैं
एक अलौकिक नेह निर्झर
तले सर्वाग विलय हुआ
नहाता हूँ
भाव संसार का हमराग हुआ सा
मौन विरान सन्नाटा
बाहर बाहर
भीतरी सौन्दर्य का मात्र
मेरा चित हैं अंश
यह दशा
खुद से खुद मे खोयी
बडा जटिल हैं शब्दाकार देना
केवल पकड आती हैं
बाँधता जाता
अनुभूत करता हूँ तुझे
यही तो दूरी बनाते
शब्द तुम
कहां आते तुम
कितने दिन ओर
जीवन रहते
फक्त एक बार तो आना
शब्दों तुम
कि मैं कह पाऊ मेरा
लौकिक परलौकिक सत्य
अन्यथा
न जाने कितने हृदय
अछूते रह जायेगे
दर्द का दरिया शान्त होगा कैसे
आना भी
रूलाना मत अब
अब जीवन तो हैं
पर तुम्हारे लिए
अजनबी हूँ मैं ।
छगनलाल गर्ग।




वीणा तेरी तरंग मेरी ।

आशक्त हूँ मैं
स्वर लहरिया भाती हैं
बजने दो
प्राण राग छलकने दो
कि थोड़ा नहा लू स्वर गंगा
धारा बहने दो
कहां आता मुझे
वीणा बजाऊ
तार कहां
कंपन कैसे हो
फिर कांपती हैं
सधी कहां अंगुलिया मेरी
बस पास आऊ थोड़ा
बैठने दो
आशक्त मुग्ध सा
नहा लू संपूर्ण अस्तित्व लिए
विलय हो जाने दो
अबाध निरन्तर
कि मैं तनिक न बचू
एक रस होने दो
वीणा तुम्हारी तुम्हे लिए
बस जाये प्राण मेरे
कंपन उठे भीतर
तुम्हारी
तंरगित सस्वर
कहां आदान प्रदान
कहां दृश्य बनाना हमें
भीतर भीतर तेरे प्राण राग
कंपे
वहीं कंपन मेरी बन जाये
वीणा
रहे तेरी
पर राग रागिनी
कंपित तंरगे गूँजे
भीतर भीतर
मेरी
मेरे प्राण
मूक स्वरो की यह
पुकार सुनो।।
छगन लाल गर्ग।

अस्तित्व मंथन हुआ हैं ।

अस्तित्व मेरे तू मंथन हुआ
भीतर बाहर का साक्षी हैं  तू
मेरे तमाम कार्यो का शाश्वत आकलन
ओर करेगा कैसे
बाहर भीतर कहां मेल खाता तू
अब हूँ
इस पल
क्या वैसा हर माहोल मे
रह पाता हूँ
रहते तुम अपने आकार प्रकार को लिए
बाहर बाहर
पर भीतर तुम कैसे
अस्तित्व मेरे
क्या कहूँ
गाँठे घनी कैसे खोलू
एक खोलता तभी
दूसरी मे खुली गाँठ भी
उलझ जाती
विवश घना तेरा आपा
कैसे बताऊ
तेरी सौम्यता ताजुज्ब मे डालती मुझे
जब तुम बात करते अपनो से
मीठी मीठी
भाव भीनी
तुम्हारा यह रूप कहां पाता
जब होते दफ्तर
या कि किसी लाचार बैबश को
पाते आसरा माँगते
बिफर उठते
उग्र रूप देखा हैं मैंने
कैसे कर लेते सब
यह कलाबाजिया खूब रंग लाती
मेरे अस्तित्व
जब तुम्हें गरज हो
स्वार्थ साधने की
तुम्हारा विनयशीलता का
उद्धरण इतिहास मे कहां हैं
जो मैं पाता
जब तुम्हारा कर्मचारी
मानवीय भूल भी करता
कितने खूखार बन जाते तुम
ओर उसकी हारी बिमारी मे
नियमों का पिटारा
खोल खोल डराते
बडे कलाबाज हो
मेरे अस्तित्व
कितनी मासूमियत से
बीबी की फरमाइसो को
आत्मीयता गहरी पाले
आदेश समझ
वफादारी निभाते हो
तुम्हारा भीतर बाहर का
फासला
क्या कहू
समझ नहीं आता
शायद यही
जीवन जीने की कला हैं
जो भी हो
मंथन मेरा बढा हैं
विचार भारी बौझ
बने हैं ।
छगनलाल गर्ग।

Wednesday, 7 October 2015

आहत क्षण ।

जीवन यह हैं तेरा कैसा रूप
होता नहीं  कहां मन अनुरूप
सोचा करते आनन्द स्वरूप
हो जाता अति विषम कुरूप।
क्या यही जीवन तुझे  स्वीकारू निसन्देह
या कि हैं कोई तेरा अन्य फल भी सुखदेह
अभी संचय गया नहीं पर थक चुकी देह
प्राण अभी तक रहे रीते सुना पड़ा तन गेह।
कहू अति मनमोहक भी
रहू चित रंग विस्मृत भी
बनू नित नव मादक भी
चाहू गगन सम गरिमा भी।
रहू विमल चित सहृदय भी
चलू पावन ओर निर्लिप्त भी
डरू घना  पापमय पथ भी
करू नित पुण्यमय कर्म भी।
भावना केवल भाव ही न रहे
निष्क्रियता जीवन भार न रहे
कामना कर्म मय धरातल बहे
परहित ही समर्पित जीवन रहे।
प्राण तार टूटा टुकड़े हैं तडप भारी
घिर चुके प्रचण्ड दर्द अनुताप जारी
राह मिले कहां जीना कैसे भंवर भारी
करवट ले कैसे शिकंजा कसा हैं भारी।।
हाल हैं हताश हुए हारा हृदय हैं हिमम्त होगी कहां से
मेरे निकट हैं शौर शराबा पर चित छा गया सन्नाटे से
पास हैं भीड़ भारी निर्ममता से रौदती अरमान दिल से
चेतना थक चुकी हैं मूदती ऑखे मोहित होती प्राण से।।
चाह अब केवल सिमट कर आस्थामय हो गयी हैं
जग प्रलोभन तुच्छ होकर ऑख औझल हो गये हैं
कामना का राज शास्वत चमक से मंथरा गया हैं
सुंदर सलोने साज सारे झूठे भ्रामक हो गये हैं ।
नहीं हैं हमदर्द कोई संताप बाँटे सुख मिले
हैं गहरा अंधकार कैसे हृदय ज्यौति खिले
आसरा अब देह माँगे बेसहारा मृत्यु मिले
अपने कहू किसे सब अपने ही बेवफा मिले ।
जाऊ कहां कोई कहे जहाँ जीवन राग पाऊ
लाऊ कहां से माँग कर किरण उजाला पाऊ
उठाऊ कैसे बौझ सारा भार दबता ही जाऊ
हादसा जीवन बना हैं सुरक्षा कहां से लाऊ।
पीर उमडती प्रेम की निर्मल छाँव भी होती हैं क्या
नीर डूबे देह मे भी प्राण की रहे कुछ आस भी क्या
चीर छाती देखता रहा हूँ तृप्ति का अहसास हैं क्या
गिर कीचड़ दागित देह ले ढूँढता देह बेदाग हैं क्या ।
रास्ते सारे लगते बेढंगे राहगीर राह चलेगा कैसे
डालते हैं जाल मायावी फसता मुसाफिर फिर से
ओर होकर संग मे नित जाम चखता मादकता से
जर्जर छोडती माया तब चिखता रूदन स्वर से।।
हाहाकार रूदन क्रदन संसार यही पहचान तेरी
झूठ मूठ की लावण्यता जो चित लुभाये रे बेरी
ऑख मूदे सपने सी तृष्णा घेरे जीवन माया नगरी
बार बार फसता जी जान मिटी नहीं जडता मेरी ।
सपने बनाते अपने अगर निन्द होती गहरी
करते रहते कर्म भी अगर दर्द न होते प्रहरी
लडते बनते लायक भी रहती शक्ति ठहरी
मर्म भी कहते अगर सुन लेती दुनिया बहरी।
आज का पल कल का ताना बाना बुनता हैं कहते हैं
पल पकड ले गया वक्त वापस नहीं आता हैं कहते हैं
सच्चा बन सच्चाई की हमेशा जीत होती हैं कहते हैं
सुना किया वक्त से दगा मिला क्या झूठ ही कहते हैं ।
शायद कथन न हो झूठ हम ही झूठे हो
शायद लायक न हो हम कर्म ढीले हो
लगता हैं मालिक समर्थ को ही देता हो
शायद माफिक वक्त के हम नही रहे हो ।
घृणा से गुजरा जीवन शब्दों तक पहुँचा तो हैं
जग के मेहनतकस का भाव थोड़ा पलटा तो हैं
प्रजातंत्र हाफते ही सही अंजाम तक लाया तो हैं
इस मजदूर कौम का संघर्ष कुछ भाव पाया तो है।
छगनलाल गर्ग।



आहत क्यों ।

जीवन हाँ यह तेरा कैसा रूप।
होता नहीं तनिक मन अनुरूप ।
सोचा करते आनन्द स्वरूप।
हो जाता अति विषम कुरूप।।
क्या यही तू स्वीकार निसन्देह।
या कि तेरा अन्य फल सुखदेह।
संचय गया कहां थक चुकी देह।
प्राण रहे रीते सूना पड़ा तन गेह।।
कहू अति मन मोहक भी।
रहू नित चित विस्मृतभी।
बनू मैं नित नव मादक भी।
चाहू गगन सम गरिमा भी।।
रहू विमल सहृदय भी।
रहू पावन निर्लिप्त भी।
डरू पापमय पथ भी।
करू पुण्यमय कर्म भी।।
भावना केवल भाव ही रहे।
निष्क्रियता का भार न रहे।
कामना कर्ममय धरातल बहे।
परहित समर्पित जीवन रहे।।
छगनलाल गर्ग।

अतीत अब जाओ ना।

अतीत अब जाओ ना
रह रहकर आते हो
अनचाहा दर्द
बार बार भीतर आते ही
जलती तंरग बनकर
चिरते हृदय को
टीस जलन की
दे जाते हो
कैसे जीऊ कुछ बतलाते जाओ
मैं कसूरवार तुम्हारा
कि तुम्हें जीया
पर क्या आग्रह रहा मेरा
कि तुम्हें जीऊ
अन्नत कामनाओ की आस
तुमने ही तो दी मुझे
रस सागर का स्त्रोत तुम्ही
तो बने
लहरों की असीम ऊँचाई
तुम्ही तो थे
ऊँचा नीचा मैं कहां हुआ
सौन्दर्य तुम्हारा ही तो था
कि मैं डूबा
इतराता रहा अपनी
किस्मत पर
अबोध सा मासूम हृदय
तुमही से तो जुड़ा
अथाह पारावार सुखो का
तुम ही तो थे
कहां नहीं रहे तुम
साथ मेरे
पल पल तुम्ही थे मेरे
केवल तुम्ही
कर्म धर्म सूख दुख
मोह ममता रूठना मनाना
तुम्ही मे मेरा
बसता था
अतीत की मार्मिक स्मृति
कहां हो तुम
तुम्हारा इस तरह जाना
कि मात्र
स्मरण भर जीऊ
ओर स्मरण
कहां आत्म चैन देता हैं
विरह की घनीभूत
गहराई भीतर
खो जाता मैं
किनारा कहां
मेरा अस्तित्व विलिन मत करो
अतीत
अन्तराल मेरा तुम्हारा
दिनोंदिन बढता हैं
बैचेन हूँ मैं
अन्तराल का बढ़ना
कसक टीस
गहरी करता हैं
ओर तुम
बार बार पल पल
छाया बने
जीते हो मुझे
पर मेरे जीने का
कोई तो ठोर हो
तुम्हें जीते ठोर कहां
तुम्हें छोड़े प्राण कहां
कसमकस कैसा दे गये
मेरे अपने अतीत
दिव्यता लाऊ कैसे
कि तुम न आओ
सूक्ष्म बन
ओर मैं तुम्हारी स्मृति बिना
साँस ले सकूँ
पराजित हुआ जीवन मेरा
अदृश्य के हाथों
अतीत विनय तुम्हें ही
तुम्हें ही करता हूँ
अतीत अब जाओ ना।
छगनलाल गर्ग।


Tuesday, 6 October 2015

मोहपाश तेरा।

मोह पाश बना श्रृगार तेरा
चित चेतना का राज मेरा
राग भरा मृदुल गान मेरा
भाव सज्जित संसार मेरा।
       रूप तेरा चाँदनी की सुखद ठंडक छाया घनी हैं
        नयन चितवन तीर बनकर चित को चिरती हैं
        अंचल सरकता पवन संग तंरग सा डोलता हैं
       बैसुध होकर राग सारे चंचल चित मचलते हैं ।
रात की चटकती चाँदनी तुम
गात का मदहोश जाम हो तुम
बात मीठी रसधार बहती तुम
पात बैठी अंगूर की गाँठ हो तुम ।
        भावना की धार चित उठती
         ऑधी बनी अब भीतर उडती
         भरे बादलो का रूप उमडती
         घनी वासना तन फोड फूटती।
धारा रसमय बहने लग गयी हैं
मार मदन की तन मे लग गयी हैं
विलय से तन मन आनंद भरा हैं
दिव्य राग लहरी भीतर बहता हैं ।।

खो चित मेरे ।

प्राण राग मेरे
अलसाये मृदुल भाव
घने हो
झील सी ऑखे
बंद किये तुम सोये
घने हो
मुखडा तुम्हारा घने
रास सौन्दर्य मे
खिला खिला सा
भरा भरा सा
पूर्ण चन्द्र का सौन्दर्य समेटे
पहेलु बदलता
चित को हरता
शान्त सरोवर सा
शीतल मादक
चित लहरे भरता
गात सहित मेरे
मन को भरता
उषा खिली पर
सौन्दर्य बधा मे
ठगा लुटा सा तुझे निहारू
शीतल शीतल मद मारती
नवल हवा का झौका बनती
चित तले मे ठंडी ठंडी
हे मेरी मलिका
सिरहन उठती
कुन्तल कमनीय
कमल पाखूरी से अधरो मे
निशा काल के
अमन्द राग का
पान अबाधित किये घना हैं
कैसे जगती
चहक उठी अब
मेरे मितवा
राग विराग लिये
पंखी घनेरे
तुझे पुकारे
राग विलय का खेल रे जीवन
पल पल पाऊ
जी भर पाऊ
फिर फिर गाऊ
मितवा मेरे
खो चित मेरे।
छगनलाल गर्ग।

समझ आती नहीं ।

क्रिया की सीमा
थकान पर ठहरती हैं
साँस लेती दो घड़ी
अहसास पाती काम का
सन्तोष तनिक आता
पर काम का अधूरापन
खलता हैं
यह बाकीपन
जिन्दगी साथ साथ
अबाध चलता हैं
शायद कोई सरकारी दफ्तर हैं
बाहर देहरी बनी चिढिया
मेरी साथी बनी हैं
सड़क से फासला बनाये
पेढी पर बैठा हूँ
निगाहे बोर्ड पर लिखे
शब्दों पर जाती हैं
सहकारी मीनी बैंक
का लेबल
भीतर की सफाई वाली
बाई बाहर आती हैं
बाबूजी उठो
कहीं ओर बेठो
सफाई करनी हैं
उठता हूँ अचकचाया सा
बढता हूँ आगे
नव निर्माण होता
देखता हूँ
भवन कई मंजिला
विशाल भवनो की गहराई छाया
मुझे छूती हैं
पर तभी रूकता हूँ
भिगार लेने वाले ओर
मकान रखवाली
चौकीदार बीच झडप
होते देखता हूँ
लोहे के बचे सरिये बेचता
चौकीदार
चिल्लाता कहता
बेईमान तोल मे गड़बडी
करता हैं
पूरे बीस किलो हैं
किलो कम क्यों बताता
गिडगिडाता हैं
भिगार वाला
साहब भाव भी तो
ओरो से ज्यादा देता हू
मेहनत से पेट पालता साहब
मैं बढता हूँ
समझ कहां पाया
बेईमान चोर
चौकीदार
या कि भिगार लेने वाला
जिन्दगी तूझे खूब जिया
पर समझ हैं कि
आती नहीं ।
छगनलाल गर्ग।






Monday, 5 October 2015

  निन्द कहां हैं
कि कह सकू सोया
रात भर
बिस्तर पर तन बिछा देना
फिर पहेलु पर पहेलु बदलना
ऑखे दुसरो की देखा देखी
बन्द कर लेना भर
निन्द आना कह दू
नहीं कहना ऐसा भी
एक अहं को चौट होगी
कि अर्थ क्या निकाले जाये
हीनता या बेचारगी का
भाव न आ जाये
ओरो के चित
कहता भरपूर सोया
निन्द अच्छी आई
कितना कृत्रिम हूँ मैं
कि यथार्थ जीता भी तो
बनावट के सहारे हूँ
क्या दिक्कत थी सच्चाई कहते
पर क्यों
सच्चा कहना
झूठ आज खुद को भी
ओरो भी लुभाता हैं
ओर हम झुठ बनावट के
बिम्ब यान्त्रिक बने हैं
स्वयं से फासला
बहुत बढ़ा चढ़ा हैं
असल जीता कहां हैं
अनुभूति कहती कहां हैं
कि भीतर तू जिन्दा हैं
तू तो भीड़ हैं
भीड़ तेरे भीतर हैं
तू बाहर बाहर
बनावटी दिखता भर हैं
शून्य से भी बदहाल
जिन्दगी के अस्तित्व
संघर्ष तले जीता हैं
धुआँ घना भरा नथुनो मे
मित्र ऐसे मे
क्यों न कहूँ
निन्द कहां हैं ।
छगनलाल गर्ग।

भिगो देती हो।

भार कितना ओर बाकी
हृदय हारा रे अब साथी
भरा घना पर प्राण बाकी
अंधकार केवल मेरा साथी।
रोशनी कैसी मेरे जीवन
दीया जले पर प्राण रीते
चेतना नित भार उपवन
विरह जलजात चित बीते।
तन बना प्रपात सा यह
झरे नित यह रीत रहता
भाव हैं थके थके विरह
शिथिल बने हृदय रोता।
मुस्कराते तुम खड़े हो
तीर छवि बन प्राण लेगी
झुझलाते पीर देते हो
उष्मा तपन ही जला देगी।
निर्झर सा हैं जोश तुम्हारा
अधो प्रवाह बहे ऑधी सा
जाल भंवर फस ढूँढू सहारा
नेह डूबा खोजे तिनका सा।
आह।री वेदना तुम भी क्या
चुपके चुपके आती हो
वाह ।रे जीवन तुम भी क्या
रूप नया दिखलाते हो।
दुख विशाल हो सार हुआ हैं
जलन तपन का चित्र हुआ हैं
काल घिरा अभिशाप हुआ हैं
ईश वरदान का नाश हुआ हैं ।
कब तक  रहूँगा कैसे कह दू
बोल निरसता किसे सुना दू
व्याधि घनी  चित ही रख दू
भार मेरे तुझे खुद ही रख दू ।
नित दिन प्राण तुम विकल होते हो
प्रति पल जीवन हर्ष ढूँढते क्यों हो
सुने विवर तंरग टकराती क्यों हो
यादो चित शैल को भिगो देती हो।।
छगनलाल गर्ग।








भिगो देते हो।


Saturday, 3 October 2015

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anupama's sukrity : कविता मानव सृजन नहीं ....

anupama's sukrity : कविता मानव सृजन नहीं ....
मत कहो
इतना कि चित भर जाये
प्राणों का करूण गुजंन
हृदय न समाये
ओर राग सारे अकारण
अधूरे रह जाये
उदभ्रान्त हैं जीवन
भटकती पवन
शून्य हृदय गगन मे
थपेडे खाती सी
शिला खण्ड टकराये
निस्सार हूँ मैं
गहन विवर हुआ हैं
संसार मेरा
शून्य हूँ फिर भी
शेष हूँ
करूण जीवन शून्यता मे भी
अस्तित्व कहां खोता
झूठे मोह से विश्वास जोड़
नित जीता जाये।
अवसाद घडा भर गया हैं
हर्ष जीवन
पात्र कहां हैं कि
महक जीवन आसरा पा जाय।
छगनलाल गर्ग।


anupama's sukrity : कविता मानव सृजन नहीं ....

anupama's sukrity : कविता मानव सृजन नहीं ....
मत कहो
इतना कि चित भर जाये
प्राणों का करूण गुजंन
हृदय न समाये
ओर राग सारे अकारण
अधूरे रह जाये
उदभ्रान्त हैं जीवन
भटकती पवन
शून्य हृदय गगन मे
थपेडे खाती सी
शिला खण्ड टकराये
निस्सार हूँ मैं
गहन विवर हुआ हैं
संसार मेरा
शून्य हूँ फिर भी
शेष हूँ
करूण जीवन शून्यता मे भी
अस्तित्व कहां खोता
झूठे मोह से विश्वास जोड़
नित जीता जाये।
अवसाद घडा भर गया हैं
हर्ष जीवन
पात्र कहां हैं कि
महक जीवन आसरा पा जाय।
छगनलाल गर्ग।


Friday, 2 October 2015

तलाश

सच कहता
अनुभूति का भार बढ़ा हैं
कहने दोगे
स्वीकार करना चाहता
जीवन के दाग
अनायास आये गये
पर उनका आना
रही त्रासदी
जो सालती हैं मुझे
कसक भरी वेदना की ऑधी
हृदय घेरे हैं
भंवर बीच झकझोले खाता
कहां से लाऊ स्थिरता
निन्दा का वार झेलता
मेरा जीवन
कसूर हुआ तो हैं
संकोच नहीं मुझे
कहते
शायद सभ्य हूँ
निन्दा हो
दलितों से नाता जोड
समाज से बहिष्कृत हुआ  हूँ
हेयता की उठी नजरें
भीतर को
बार बार भेदती हैं
ओर मैं
सिमटा भीतर अपने
बौना हो चुका हैं
सोचता हूँ
दूर कहीं  दूर
जहाँ न जाने मुझे कोई
पहुँचू
मेरा पलायन क्या
सत्य होगा
या कि भुलावा
क्या इन्सानो की दुनिया
कहीं ऐसी भी हैं
जहाँ सिर्फ मानव भाव हो
दिल के रिस्ते
दिल से छूते हो
जहाँ नेह घनीभूत हुआ
जीवन दान
दे मुझे
तलाश अधूरी हैं ।
छगनलाल गर्ग।




Thursday, 1 October 2015

 कब तक पुकारू गला रूघ गया  हैं ।
किसे सुनाऊ कथा श्रोता चला गया हैं ।
विकराल काल तेरा कैसा हैं तांडव
भंयकर भाल भूतल भीषण ठहराव
विराग राग विषम विपरीत कालरव
कोमल गात प्रहार देता कठोर फैलाव।
जीवन हैं यह तेरा कैसा रूप
होता नहीं तनिक मन अनुरूप
सोचा करते आनन्द स्वरूप
हो जाता हैं अति विषम कुरूप।
क्या यही हैं तू स्वीकारू निसन्देह
या कि कोई तेरा अन्य फल सुखदेह
अभी संचय गया नहीं थकी हैं देह
प्राण अभी तक रहे रीते सुना तनगेह।।
छगनलाल गर्ग।