सपने थे
बिखर गये
उम्मीदें थी
टूट गयी
नन्हे से फुल मेरे
सुकुमार गात तुम्हारा
आज भी यादो मे हैं
नटखटापन कहां भूला
हृदय का जुड़ाव
कहां विलग कर पाया
अबोधता तुम्हारी
निश्छलता भोली सी
समझ आते ही
तुम मेरे से अधिक
दुनिया समझ गये
सूझबूझ तुम्हारी
शुभ रही
तुम्हारा जीवन निखरा
प्रतिष्ठित हुए तुम
पर टीस भर गये
अप्रत्यक्ष ही कहो
कहीं न कहीं
मेरा छाया तुम्हारे साथ
जरूर रहा होगा
आज केवल मैं बचा
मेरा छाया नहीं
तुम हो
अहसास हैं दुनिया का
पर अब तुम मेरे नहीं रहे
जो थे कभी
मेरे अंश मेरे तत्व
मुबारक हो तुम्हारी दुनिया
तुम्हारी खुशियाँ
बुलाया था मुझे
अपने सपनों की नीव
खोदने से पहले
जहां बनना था तुम्हारी
खुशियों का आशियाना
जानता हूँ
आग्रह कर बुलाया था मुझे
कि लोग देखे मुझे भी
ओर तुम्हें उलहाना न मिले
मैं टुकुर टुकुर ताकता
देखता था तुम्हें
जब पंडित के मंत्रोंच्चार मे
तुम पालथी मारे
मेरे विसर्जन का मंत्र
पढ़ रहे थे
समझा था मैं
अब नहीं रहे तुम मेरे
तुम्हारा परिवार
बड़ा खुश था
तुम्हारी जीवन संगिनी
विभोर थी
केवल कहीं विलगता का दंश
झेलता दुखी था तो
मेरा हृदय
तुम्हारी नयी दुनिया से
बहुत दूर
फैका जा रहा था मुझे
मैं अभी कहां भूला था
मेरे जवान पुत्र की
असामयिक मौत
तुम्हारे छोटे भाई की
स्मृति मे खुदी जा रही नीव
आशाओ का खजाना
तुम बने थे
अब निरह सा बना
बिखरते टुकड़े आशाओ के
लहराते चौट करते जाते
मेरे हृदय मे
चलो यह संसार का मेला
कहते हैं क्षणिक हैं
पर तुम्हें कहीं ओर
अपनी जड़ से कट कर
आशियाना बनाना सूझा
पर अंश हो मेरे
कभी तो हवा का झौका बनकर
मेरी तरफ बहो
जर्जर हो चुका मैं
केवल जड़ बना हूँ
नहीं होता पोषण
नहीं हैं चौकीदार
सूखता जाता
ओरो का कारण नहीं
निज अंश के रहते
अब नीर बह चुके
अपवाद बना हूँ
रहते जिन्दगी नहीं समझा
जितना समझे तुम
चलो यही सही
निश्वास लेता जाता हूँ
हर बार की तरह
शायद ईश्वर तक पहुँचे।
छगन लाल गर्ग।
बिखर गये
उम्मीदें थी
टूट गयी
नन्हे से फुल मेरे
सुकुमार गात तुम्हारा
आज भी यादो मे हैं
नटखटापन कहां भूला
हृदय का जुड़ाव
कहां विलग कर पाया
अबोधता तुम्हारी
निश्छलता भोली सी
समझ आते ही
तुम मेरे से अधिक
दुनिया समझ गये
सूझबूझ तुम्हारी
शुभ रही
तुम्हारा जीवन निखरा
प्रतिष्ठित हुए तुम
पर टीस भर गये
अप्रत्यक्ष ही कहो
कहीं न कहीं
मेरा छाया तुम्हारे साथ
जरूर रहा होगा
आज केवल मैं बचा
मेरा छाया नहीं
तुम हो
अहसास हैं दुनिया का
पर अब तुम मेरे नहीं रहे
जो थे कभी
मेरे अंश मेरे तत्व
मुबारक हो तुम्हारी दुनिया
तुम्हारी खुशियाँ
बुलाया था मुझे
अपने सपनों की नीव
खोदने से पहले
जहां बनना था तुम्हारी
खुशियों का आशियाना
जानता हूँ
आग्रह कर बुलाया था मुझे
कि लोग देखे मुझे भी
ओर तुम्हें उलहाना न मिले
मैं टुकुर टुकुर ताकता
देखता था तुम्हें
जब पंडित के मंत्रोंच्चार मे
तुम पालथी मारे
मेरे विसर्जन का मंत्र
पढ़ रहे थे
समझा था मैं
अब नहीं रहे तुम मेरे
तुम्हारा परिवार
बड़ा खुश था
तुम्हारी जीवन संगिनी
विभोर थी
केवल कहीं विलगता का दंश
झेलता दुखी था तो
मेरा हृदय
तुम्हारी नयी दुनिया से
बहुत दूर
फैका जा रहा था मुझे
मैं अभी कहां भूला था
मेरे जवान पुत्र की
असामयिक मौत
तुम्हारे छोटे भाई की
स्मृति मे खुदी जा रही नीव
आशाओ का खजाना
तुम बने थे
अब निरह सा बना
बिखरते टुकड़े आशाओ के
लहराते चौट करते जाते
मेरे हृदय मे
चलो यह संसार का मेला
कहते हैं क्षणिक हैं
पर तुम्हें कहीं ओर
अपनी जड़ से कट कर
आशियाना बनाना सूझा
पर अंश हो मेरे
कभी तो हवा का झौका बनकर
मेरी तरफ बहो
जर्जर हो चुका मैं
केवल जड़ बना हूँ
नहीं होता पोषण
नहीं हैं चौकीदार
सूखता जाता
ओरो का कारण नहीं
निज अंश के रहते
अब नीर बह चुके
अपवाद बना हूँ
रहते जिन्दगी नहीं समझा
जितना समझे तुम
चलो यही सही
निश्वास लेता जाता हूँ
हर बार की तरह
शायद ईश्वर तक पहुँचे।
छगन लाल गर्ग।
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