आँकाक्षाऐ गहरी हुई
चेतना नहीं हैं स्थिर
नहीं समा पाती अस्तित्व
सपनों की दुनिया
बिखरे से टूटे से
जीना होता यह जीवन
नहीं पाता
ठावस भरी ठौर
हर पल
एक अधूरापन
महसूसता
जीता हूँ जिन्दगी तुझे
घर ओर बाहर
नहीं पाता अंतर
कि फर्क आये रफ्तार
बाहर से ज्यादा
ज्वलंत घर का कोलाहल
नित जिन्दगी
माँगती कीमत जीने की
परिवार मे रहने की
ओर बाहर
मिलती जाती
भीतर की मार
अफसरों की डाँट
ओर कारण बताओ नोटिस
अजीब तपन हैं
जिन्दगी तेरी
न घर न बाहर
कहीं भी स्वागत तेरा
लगता है
बढ़ती हैं नित
तपन अवनी की।
छगन लाल गर्ग।
चेतना नहीं हैं स्थिर
नहीं समा पाती अस्तित्व
सपनों की दुनिया
बिखरे से टूटे से
जीना होता यह जीवन
नहीं पाता
ठावस भरी ठौर
हर पल
एक अधूरापन
महसूसता
जीता हूँ जिन्दगी तुझे
घर ओर बाहर
नहीं पाता अंतर
कि फर्क आये रफ्तार
बाहर से ज्यादा
ज्वलंत घर का कोलाहल
नित जिन्दगी
माँगती कीमत जीने की
परिवार मे रहने की
ओर बाहर
मिलती जाती
भीतर की मार
अफसरों की डाँट
ओर कारण बताओ नोटिस
अजीब तपन हैं
जिन्दगी तेरी
न घर न बाहर
कहीं भी स्वागत तेरा
लगता है
बढ़ती हैं नित
तपन अवनी की।
छगन लाल गर्ग।
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