संदर्भों का सच
प्रकट करता हैं जीवन
क्रिया प्रतिक्रिया मे
जब जीने की सार्थकता देते हैं संदर्भ
ओर खीचते हैं लकीर
संयमित आचरण
जीवन जीने की
हर आचरण को संयमित
ओर
संदर्भों से जीने की शैष्टा
नहीं हो पाती फलीभूत
एक अंतहीन कसमकस बीच
गुजरता जाता हैं जीवन
कारणों की सच्चाई
संचय जाल मे गूथी सी
नहीं दे पाती तर्क
गहराई तलाशता गूथ जाता हूँ
स्वयं भावनाओ की श्रृखला मे
कि समझ नहीं आता
कारण
संदर्भों की असत्यता
या कि यथार्थ की जटिलता
संदर्भ घनीभूत होते जाते
वक्ताओं के प्रवचनो मे
ओर पाते हैं प्रति क्रिया
तालियो की गडगडाहट ध्वनि घनी
या कि सुबह शाम
आराध्य की आराधना निमित्त
कथा वाचको के प्रवचन तक
जहां अनमने श्रौता
आस्तिकता का प्रदर्शन करते
ऊघते आकुलाते
भाव विभोर होने की दशा का
करते जाते तमाशा
असत्य ही सही
करते हैं देखा देखी का सत्य
असलियत भाव
कहां पाता हूँ संदर्भों मे
पहचान बिखेरे शब्द
होते जाते हैं मृत
जीवन यथार्थ नहीं लेते
संदर्भों का सत्य
जीवन बन साक्षी बने तो
शायद निखरना हो जीवन का
परिवर्तन बेहोशी भरा हैं यह
हो रही हैं
नये अर्थ तलाश की खोज
संदर्भ शब्दों की
बदलती भाव धारा
असली अर्थो को धत्ता बताती
देती जाती नये अर्थ
ओर आते हैं नये संदर्भ
तथ्य ओर साक्ष्य लिए
जीवन का हर पल
अपना बनता अपना सत्य जीता
आज का अति प्रबुद्ध मानव
भूलने की सभ्यता तले
सिसकते हैं संदर्भ
ओर बनती जाती जिन्दगी
बोझिल ओर बेहोश
शब्दों की चमक
फिकी हुई हैं पर मिटी नहीं हैं
असलियत यह हैं कि
शब्द चमक तो हैं
पर जिन्दगी नहीं देते
यह ससीम जीवन
न गूजरे उलझनों के भंवर
जीता हूँ पल
जैसा मिला स्वीकारता
ओर ढूँढता हूँ
असलियत के बीज
कि अंकुरित हो जीवन का पौधा
हरा रहे
करता हूँ सामर्थ्य का बलिदान
ओर पाता हूँ अपना सच
जो नहीं मेल खाता
संदर्भों से
पर देता हूँ आदर संदर्भों को
रखता हूँ हृदय के पास
कमीज की जेब मे
उपयोगी बनते हैं
जब साबित करना होता हैं
स्वयं को विवेकी आस्थावान
इस्तेमाल कर लेता हूँ
यह हैं संदर्भों का सच
अनेको प्रश्न देता हुआ ।
छगन लाल गर्ग।
प्रकट करता हैं जीवन
क्रिया प्रतिक्रिया मे
जब जीने की सार्थकता देते हैं संदर्भ
ओर खीचते हैं लकीर
संयमित आचरण
जीवन जीने की
हर आचरण को संयमित
ओर
संदर्भों से जीने की शैष्टा
नहीं हो पाती फलीभूत
एक अंतहीन कसमकस बीच
गुजरता जाता हैं जीवन
कारणों की सच्चाई
संचय जाल मे गूथी सी
नहीं दे पाती तर्क
गहराई तलाशता गूथ जाता हूँ
स्वयं भावनाओ की श्रृखला मे
कि समझ नहीं आता
कारण
संदर्भों की असत्यता
या कि यथार्थ की जटिलता
संदर्भ घनीभूत होते जाते
वक्ताओं के प्रवचनो मे
ओर पाते हैं प्रति क्रिया
तालियो की गडगडाहट ध्वनि घनी
या कि सुबह शाम
आराध्य की आराधना निमित्त
कथा वाचको के प्रवचन तक
जहां अनमने श्रौता
आस्तिकता का प्रदर्शन करते
ऊघते आकुलाते
भाव विभोर होने की दशा का
करते जाते तमाशा
असत्य ही सही
करते हैं देखा देखी का सत्य
असलियत भाव
कहां पाता हूँ संदर्भों मे
पहचान बिखेरे शब्द
होते जाते हैं मृत
जीवन यथार्थ नहीं लेते
संदर्भों का सत्य
जीवन बन साक्षी बने तो
शायद निखरना हो जीवन का
परिवर्तन बेहोशी भरा हैं यह
हो रही हैं
नये अर्थ तलाश की खोज
संदर्भ शब्दों की
बदलती भाव धारा
असली अर्थो को धत्ता बताती
देती जाती नये अर्थ
ओर आते हैं नये संदर्भ
तथ्य ओर साक्ष्य लिए
जीवन का हर पल
अपना बनता अपना सत्य जीता
आज का अति प्रबुद्ध मानव
भूलने की सभ्यता तले
सिसकते हैं संदर्भ
ओर बनती जाती जिन्दगी
बोझिल ओर बेहोश
शब्दों की चमक
फिकी हुई हैं पर मिटी नहीं हैं
असलियत यह हैं कि
शब्द चमक तो हैं
पर जिन्दगी नहीं देते
यह ससीम जीवन
न गूजरे उलझनों के भंवर
जीता हूँ पल
जैसा मिला स्वीकारता
ओर ढूँढता हूँ
असलियत के बीज
कि अंकुरित हो जीवन का पौधा
हरा रहे
करता हूँ सामर्थ्य का बलिदान
ओर पाता हूँ अपना सच
जो नहीं मेल खाता
संदर्भों से
पर देता हूँ आदर संदर्भों को
रखता हूँ हृदय के पास
कमीज की जेब मे
उपयोगी बनते हैं
जब साबित करना होता हैं
स्वयं को विवेकी आस्थावान
इस्तेमाल कर लेता हूँ
यह हैं संदर्भों का सच
अनेको प्रश्न देता हुआ ।
छगन लाल गर्ग।
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