अंतर हैं सत्य तलाश मे
अनेक भ्रम गूथे हैं सत्य
अमिट सत्य की
मात्र पहचान जानता
विभ्रान्त हुआ हूँ
दो भिज्ञ सत्यो बीच
जीवन ओर मृत्यु का सच
बीच का अंतराल
कहता हूँ खालीपन
जीवन नहीं हैं यह
सत्य की पहचान विहीन
केवल जीना
भ्रान्तियो का बियावन हैं यह
ओर यह खालीपन
जीवन ओर मृत्यु बीच
जीवन का अर्थ तलाशता
भ्रमित जीता जाता हूँ
वे पल नहीं पाता
कि साक्षात्कार हो
सत्य का
ऐसे अकाट्य पल
कि कोई अर्थ पाऊ
कि जीता किस कारण हूँ
कोई सार मिलता नहीं
विमोहित हुआ हूँ
यहाँ बहते हैं घने
तृष्णाओ के झरने
करते जाते आशक्त मुझे
कि लगाता हूँ नित्य
जीवन का दाव
बहते झरनो की तरलता
आमंत्रण देती हैं मुझे
आओ मिलो गले
भिगो ना
मादकता के रस
नहीं ठहरा जाता
सम्मोहन से आशक्त
उतर जाता हूँ घने नीर
जहाँ अजनबी तृष्णाऐ
डालती हैं घेरा चारों ओर
फैलाती जाती जाल
कसता जाता चिकंजा
छटपटाहट होती दम घूटता सा
संघर्षरत हूँ
नहीं पाता हूँ किनारा
अब डूबना ही नियति मेरी
आकंठ भराव जल का
भीतर घूटता हैं
मृत्यु का जल
श्वास रूकी हैं मेरी
अब अदृश्य हुआ हूँ
कदम बढते हैं अदृश्य की ओर
खालीपन से छूटता जाता विमोह
विवश हुआ बढता हूँ
मृत्यु के सत्य की ओर
अब कसमकस नहीं रही
जीने की
निढाल हुआ जाता हूँ
अंतिम यात्रा सत्य की
शायद सत्य की गुन्जाईश का
यह आखिरी सोर
सत्य पाया सा
बढता हूँ अंतिम सत्य की ओर।
छगन लाल गर्ग ।
अनेक भ्रम गूथे हैं सत्य
अमिट सत्य की
मात्र पहचान जानता
विभ्रान्त हुआ हूँ
दो भिज्ञ सत्यो बीच
जीवन ओर मृत्यु का सच
बीच का अंतराल
कहता हूँ खालीपन
जीवन नहीं हैं यह
सत्य की पहचान विहीन
केवल जीना
भ्रान्तियो का बियावन हैं यह
ओर यह खालीपन
जीवन ओर मृत्यु बीच
जीवन का अर्थ तलाशता
भ्रमित जीता जाता हूँ
वे पल नहीं पाता
कि साक्षात्कार हो
सत्य का
ऐसे अकाट्य पल
कि कोई अर्थ पाऊ
कि जीता किस कारण हूँ
कोई सार मिलता नहीं
विमोहित हुआ हूँ
यहाँ बहते हैं घने
तृष्णाओ के झरने
करते जाते आशक्त मुझे
कि लगाता हूँ नित्य
जीवन का दाव
बहते झरनो की तरलता
आमंत्रण देती हैं मुझे
आओ मिलो गले
भिगो ना
मादकता के रस
नहीं ठहरा जाता
सम्मोहन से आशक्त
उतर जाता हूँ घने नीर
जहाँ अजनबी तृष्णाऐ
डालती हैं घेरा चारों ओर
फैलाती जाती जाल
कसता जाता चिकंजा
छटपटाहट होती दम घूटता सा
संघर्षरत हूँ
नहीं पाता हूँ किनारा
अब डूबना ही नियति मेरी
आकंठ भराव जल का
भीतर घूटता हैं
मृत्यु का जल
श्वास रूकी हैं मेरी
अब अदृश्य हुआ हूँ
कदम बढते हैं अदृश्य की ओर
खालीपन से छूटता जाता विमोह
विवश हुआ बढता हूँ
मृत्यु के सत्य की ओर
अब कसमकस नहीं रही
जीने की
निढाल हुआ जाता हूँ
अंतिम यात्रा सत्य की
शायद सत्य की गुन्जाईश का
यह आखिरी सोर
सत्य पाया सा
बढता हूँ अंतिम सत्य की ओर।
छगन लाल गर्ग ।
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