Monday, 28 December 2015

आते हो।

आते हो
स्मृति पथ नित
स्नेह राग प्रतिछाया
बने तुम
दे जाते हो
सूने हृदय को
स्पंदन तंरगित वीणा स्वर
बज उठते नुपुर
रग रग मे फिर फिर
झंकार रस भरी घनी
भर देते हो
संगीत लय भरा स्वर
उभर उभर कंठस्थ चला
पाना चाहे राग वहीं
संयोग क्षणो का
अमन्द रागमय रस
संतुष्टि मे पिया नित नित
अधरो से रस का प्याला
होले होले
विरल गति मय
फिर भर देते हो
अलक तुम्हारे
घने मेघ बने
मलयज गंध का
सुरभित झौका
हृदय तल मे फिर
नासिका मग से
आता जाता
बन गया प्रियतम
श्वास अब मेरी
नित भरते हो
प्रियतम मेरे
दूर कहां हो
रमते ख्वाब बन
विराग काल को
विस्मृत नयनो से
पीते घने हो
अमन्द हृदय मे
चेतन भरते हो
नही नहीं रे
प्रियतम मेरे
चाहू मिलन अब
फिर चेतन मे
रहते रहते
अचेतन मन से
चल तो न दोगे
ठीक यही हैं
मितवा मेरे
चेतन अचेतन
मिल मिल जाते
स्मृति तुम्हारी
चित मे बसती
तृप्ति देती
स्मृति मे नित
रमते हो।
छगन लाल गर्ग।



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