Thursday, 3 December 2015

अमिट यथार्थ ।

भीतर हूँ कमरे मे
मोटी दीवारों का पुराना कमरा
सभ्य बनाया हैं मैने
छत पक्की कर आया हूँ सभ्यो की कतार मे
खपरे  तले गुजारा जीवन
थोड़ा शोभा पाया हैं
कमरे की तरह
पर महँगाई की मार झेलता जीवन
नही खोल पाया खिड़किया
विवश हूँ धूप बिना की सीलन
झेलना कमरे की
बाहर से पक्के मकान से
गरिमा पाता हूँ
ठंडक हैं भीतर
कंपकंपी छूटती हैं
परिवार के आवागमन से
दरवाजा खुला हैं
मच्छर काटते हैं
चुभन होती हैं खुजलाता जाता हूँ
नही मिटती चुभन
ठीक वैसे जैसे
भीतर के सत्यो को
तर्को के मच्छर काटते
चुभन देते हैं
सत्य की तिलमिलाहट के साथ
बाहर देखता हूँ
प्रखर दोपहरी की धूप
निकल आता हूँ बाहर
पाता हूँ सूर्य की प्रखर रश्मिया
मच्छरो की चुभन
शिथिल हुई हैं
यह प्रखर उष्मा भाती हैं
ठीक वैसे ही
जैसे अमिट सत्य
भागते दिखते हैं
तम तर्क ओर अहंकार के मच्छर
चेतन जगाता सा
प्रखर ताप
ठावस पाता हूँ
विजय को शास्वता से
मिटना ही होता हैं
असत्य के मच्छरो को
सत्य के ताप से
मिथ्या तर्क ओर अहंकार के बीज
सत्य ताप से मिटते
साबित होता हैं
अमिट हैं सत्य का यथार्थ ।
छगन लाल गर्ग।

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