Friday, 30 October 2015

बताता नहीं ।

बताता नहीं अगर दिल मानता
बस तन्हाई नसीब तोहफा ही
शब्द दिये सब्र करता
उलझा सा
भ्रम रचित अस्तित्व मेरा
उथलापन पाने आकुल
ग्रसित हुआ जटिलताओ से
कि चमत्कार बनू
गहराई का अंधा कुआ
झाके कोई थाह ले मेरी
उलझे व्यक्तित्व की
रूके थोड़ा चलते चलते
देखें मुझे
कि गहरा अथाह पर अस्पष्ट
करिश्मा हैं अहसास करें
फिर आगे बढ़े
मिलना कहां से हो
फासला विशाल अपार
जीना साधारण कहां मेरा
मनन चिन्तन तिकडम
आधुनिक जीता हूँ
इतराता अपने पर
नये नये शब्द लडिया गूथता जाता
तिकडम भिडाता
लाता किसी शायर की शब्द लडियो के तार
किसी कवि के अछुऐ सपनो की मीठास
निहाल हुआ सा
तिकडम से बन जाता भौपू औरो का
उसे तोड़ मरोड पिरो देता
अपनी कविता तार लय से
शब्दों की सुरिली बाँसूरी सुनाता जाता
मदहौश ना हो आप
रूकना तो पड़ेगा घड़ी दो घड़ी
बस इतना काफी मेरे लिए
यह जटिल जीवन
किसी ओर की बख्शीश नहीं
स्वयं चुना हैं मैंने
कहने को हो
जीवन सरल कहां
जटिल हैं घना
आपके हमारे सुलझाये
ओर उलझता
ओर अथाह अंधा कुआ बन जाता
या कि बना देता मैं
कि जिन्दगी उसमें ढूँढते ना मिले ।
छगन लाल गर्ग।

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