निन्द कहां हैं
कि कह सकू सोया
रात भर
बिस्तर पर तन बिछा देना
फिर पहेलु पर पहेलु बदलना
ऑखे दुसरो की देखा देखी
बन्द कर लेना भर
निन्द आना कह दू
नहीं कहना ऐसा भी
एक अहं को चौट होगी
कि अर्थ क्या निकाले जाये
हीनता या बेचारगी का
भाव न आ जाये
ओरो के चित
कहता भरपूर सोया
निन्द अच्छी आई
कितना कृत्रिम हूँ मैं
कि यथार्थ जीता भी तो
बनावट के सहारे हूँ
क्या दिक्कत थी सच्चाई कहते
पर क्यों
सच्चा कहना
झूठ आज खुद को भी
ओरो भी लुभाता हैं
ओर हम झुठ बनावट के
बिम्ब यान्त्रिक बने हैं
स्वयं से फासला
बहुत बढ़ा चढ़ा हैं
असल जीता कहां हैं
अनुभूति कहती कहां हैं
कि भीतर तू जिन्दा हैं
तू तो भीड़ हैं
भीड़ तेरे भीतर हैं
तू बाहर बाहर
बनावटी दिखता भर हैं
शून्य से भी बदहाल
जिन्दगी के अस्तित्व
संघर्ष तले जीता हैं
धुआँ घना भरा नथुनो मे
मित्र ऐसे मे
क्यों न कहूँ
निन्द कहां हैं ।
छगनलाल गर्ग।
कि कह सकू सोया
रात भर
बिस्तर पर तन बिछा देना
फिर पहेलु पर पहेलु बदलना
ऑखे दुसरो की देखा देखी
बन्द कर लेना भर
निन्द आना कह दू
नहीं कहना ऐसा भी
एक अहं को चौट होगी
कि अर्थ क्या निकाले जाये
हीनता या बेचारगी का
भाव न आ जाये
ओरो के चित
कहता भरपूर सोया
निन्द अच्छी आई
कितना कृत्रिम हूँ मैं
कि यथार्थ जीता भी तो
बनावट के सहारे हूँ
क्या दिक्कत थी सच्चाई कहते
पर क्यों
सच्चा कहना
झूठ आज खुद को भी
ओरो भी लुभाता हैं
ओर हम झुठ बनावट के
बिम्ब यान्त्रिक बने हैं
स्वयं से फासला
बहुत बढ़ा चढ़ा हैं
असल जीता कहां हैं
अनुभूति कहती कहां हैं
कि भीतर तू जिन्दा हैं
तू तो भीड़ हैं
भीड़ तेरे भीतर हैं
तू बाहर बाहर
बनावटी दिखता भर हैं
शून्य से भी बदहाल
जिन्दगी के अस्तित्व
संघर्ष तले जीता हैं
धुआँ घना भरा नथुनो मे
मित्र ऐसे मे
क्यों न कहूँ
निन्द कहां हैं ।
छगनलाल गर्ग।
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