Sunday, 25 October 2015

अज्ञात हूँ पथिक।

नहीं हैं दिशा बोध पर राह चलता हूँ
देखा देखी भीड़ के निरन्तर आने जाने से हौसला पाता हूँ
ओर थके कदमों सामर्थ्य से ऊपर बल लगाता बढता हूँ
दिशा हीन गंतव्य तलाशी शायद सार पाऊ थोड़ा सा
एक अर्थ जो मेरा अपना महसूस करू कि तलाश पायी
उपर चलता हूँ नीचे नदी की शिथिल धारा बहती देखता हूँ
निरन्तर गतिशील मंद मंद अलसायी सी
कितनी चल पायेगी समय जाने ठीक मेरी तरह
पूल के किनारे नुकिले हैं पर थकान ओर विश्राम की चाह बैठता हूँ
उनकी चुभती धार पर
मेरे जीवन की ठीक यही सच्चाई नौक पर ठहरी जिन्दगी
मेरी गति से मेल खाता नदी का बहाव
ओर अज्ञात गति एकरसता पाता हूँ बहाव गति ओर तरलता मे
ठीक नदी सा
मैं अज्ञात हूँ पथिक।
छगन लाल गर्ग।


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