अजीब कसमकस जीता हूँ जिन्दगी तुझे
उतार चढ़ाव का हिछोला बना हूँ तेरा
कभी ऊँचा उठा पाता एक झलक ही पलभर की ऊँचाई
कि तुरंत बिना पल गवाये नीचे कौतुहल देती तुम
धरातल से ऊँचा महीन डोर टीका अस्तित्व मेरा
कभी ऊपर धक्का खाये उठता
स्वयं की शक्ति से अछुआ बढता उपर जीवन
टीके भी कैसे हवा मे पर बार का धक्का ऊँचाई देता हैं
पराये आसरे ऊपर उठना आज की सच्चाई हैं
स्वयं की योग्यता का दौर नहीं रहा
कि परख हो सक्षमता की
खुद के पैरो से लगा ऊँचाई का धक्का अधिक भरोसा हैं
ऊंचा उठने का समत्ता सामर्थ्य का
पर देखता नये युग के सत्य स्वार्थ जीते परिमार्जित हुए जीते हैं
सक्षम हारे हताश हुए हैं
अवसर की ताक मे होनहार संभावनाएँ पाले हैं
पर हर बार योग्यता को धता बताये तिकडम कारगार हुआ हैं
मेहनती युवाओं को सभ्य युग की संभावनाऐ छलती हैं ।
छगन लाल गर्ग।






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