हाँ यही पहचान ओर होगी क्या
यही कि बस जीते हैं
सुबह शाम का एक ही रंग एक ही आकार
तब्दीली की बात बेमानी हैं इनके लिए
वही कचरे के ढेर पर रैगती जिन्दगी
लकड़ी का सहारा पाये पुराने फैके टाट के कट्टो से गंदगी समाया झोपडा
यही बस यही पूँजी पायी बाप दादो व समाज सरकार से
गहरी उपेक्षा अस्पर्शता ओर घृणा यही जागीरी इनकी
रोते चिल्लाते बच्चे मेरे मर्म को छूते हैं निकलता हूँ पास से
क्या कसूर हैं इनका जिनके माँ बाप रहते भोगते हैं भारी यंत्रणा
ना शिक्षा ना कोई सुविधा ना कोई हमदर्द
मालिक मेरे क्या तू हैं कहीं
यदि हाँ तो दे संवेदना हमारे समाज व शासकों को
यदि मानव हैं तो अपनी इस मानव जाति पर भी
हल्की सी सहृदय दृष्टि हो जिसे छिन पुष्ट हुई मानवता हमारी ।
छगन लाल गर्ग।
यही कि बस जीते हैं
सुबह शाम का एक ही रंग एक ही आकार
तब्दीली की बात बेमानी हैं इनके लिए
वही कचरे के ढेर पर रैगती जिन्दगी
लकड़ी का सहारा पाये पुराने फैके टाट के कट्टो से गंदगी समाया झोपडा
यही बस यही पूँजी पायी बाप दादो व समाज सरकार से
गहरी उपेक्षा अस्पर्शता ओर घृणा यही जागीरी इनकी
रोते चिल्लाते बच्चे मेरे मर्म को छूते हैं निकलता हूँ पास से
क्या कसूर हैं इनका जिनके माँ बाप रहते भोगते हैं भारी यंत्रणा
ना शिक्षा ना कोई सुविधा ना कोई हमदर्द
मालिक मेरे क्या तू हैं कहीं
यदि हाँ तो दे संवेदना हमारे समाज व शासकों को
यदि मानव हैं तो अपनी इस मानव जाति पर भी
हल्की सी सहृदय दृष्टि हो जिसे छिन पुष्ट हुई मानवता हमारी ।
छगन लाल गर्ग।
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