anupama's sukrity : कविता मानव सृजन नहीं ....
मत कहो
इतना कि चित भर जाये
प्राणों का करूण गुजंन
हृदय न समाये
ओर राग सारे अकारण
अधूरे रह जाये
उदभ्रान्त हैं जीवन
भटकती पवन
शून्य हृदय गगन मे
थपेडे खाती सी
शिला खण्ड टकराये
निस्सार हूँ मैं
गहन विवर हुआ हैं
संसार मेरा
शून्य हूँ फिर भी
शेष हूँ
करूण जीवन शून्यता मे भी
अस्तित्व कहां खोता
झूठे मोह से विश्वास जोड़
नित जीता जाये।
अवसाद घडा भर गया हैं
हर्ष जीवन
पात्र कहां हैं कि
महक जीवन आसरा पा जाय।
छगनलाल गर्ग।
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