सच कहता
अनुभूति का भार बढ़ा हैं
कहने दोगे
स्वीकार करना चाहता
जीवन के दाग
अनायास आये गये
पर उनका आना
रही त्रासदी
जो सालती हैं मुझे
कसक भरी वेदना की ऑधी
हृदय घेरे हैं
भंवर बीच झकझोले खाता
कहां से लाऊ स्थिरता
निन्दा का वार झेलता
मेरा जीवन
कसूर हुआ तो हैं
संकोच नहीं मुझे
कहते
शायद सभ्य हूँ
निन्दा हो
दलितों से नाता जोड
समाज से बहिष्कृत हुआ हूँ
हेयता की उठी नजरें
भीतर को
बार बार भेदती हैं
ओर मैं
सिमटा भीतर अपने
बौना हो चुका हैं
सोचता हूँ
दूर कहीं दूर
जहाँ न जाने मुझे कोई
पहुँचू
मेरा पलायन क्या
सत्य होगा
या कि भुलावा
क्या इन्सानो की दुनिया
कहीं ऐसी भी हैं
जहाँ सिर्फ मानव भाव हो
दिल के रिस्ते
दिल से छूते हो
जहाँ नेह घनीभूत हुआ
जीवन दान
दे मुझे
तलाश अधूरी हैं ।
छगनलाल गर्ग।
अनुभूति का भार बढ़ा हैं
कहने दोगे
स्वीकार करना चाहता
जीवन के दाग
अनायास आये गये
पर उनका आना
रही त्रासदी
जो सालती हैं मुझे
कसक भरी वेदना की ऑधी
हृदय घेरे हैं
भंवर बीच झकझोले खाता
कहां से लाऊ स्थिरता
निन्दा का वार झेलता
मेरा जीवन
कसूर हुआ तो हैं
संकोच नहीं मुझे
कहते
शायद सभ्य हूँ
निन्दा हो
दलितों से नाता जोड
समाज से बहिष्कृत हुआ हूँ
हेयता की उठी नजरें
भीतर को
बार बार भेदती हैं
ओर मैं
सिमटा भीतर अपने
बौना हो चुका हैं
सोचता हूँ
दूर कहीं दूर
जहाँ न जाने मुझे कोई
पहुँचू
मेरा पलायन क्या
सत्य होगा
या कि भुलावा
क्या इन्सानो की दुनिया
कहीं ऐसी भी हैं
जहाँ सिर्फ मानव भाव हो
दिल के रिस्ते
दिल से छूते हो
जहाँ नेह घनीभूत हुआ
जीवन दान
दे मुझे
तलाश अधूरी हैं ।
छगनलाल गर्ग।
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