Wednesday, 7 October 2015

अतीत अब जाओ ना।

अतीत अब जाओ ना
रह रहकर आते हो
अनचाहा दर्द
बार बार भीतर आते ही
जलती तंरग बनकर
चिरते हृदय को
टीस जलन की
दे जाते हो
कैसे जीऊ कुछ बतलाते जाओ
मैं कसूरवार तुम्हारा
कि तुम्हें जीया
पर क्या आग्रह रहा मेरा
कि तुम्हें जीऊ
अन्नत कामनाओ की आस
तुमने ही तो दी मुझे
रस सागर का स्त्रोत तुम्ही
तो बने
लहरों की असीम ऊँचाई
तुम्ही तो थे
ऊँचा नीचा मैं कहां हुआ
सौन्दर्य तुम्हारा ही तो था
कि मैं डूबा
इतराता रहा अपनी
किस्मत पर
अबोध सा मासूम हृदय
तुमही से तो जुड़ा
अथाह पारावार सुखो का
तुम ही तो थे
कहां नहीं रहे तुम
साथ मेरे
पल पल तुम्ही थे मेरे
केवल तुम्ही
कर्म धर्म सूख दुख
मोह ममता रूठना मनाना
तुम्ही मे मेरा
बसता था
अतीत की मार्मिक स्मृति
कहां हो तुम
तुम्हारा इस तरह जाना
कि मात्र
स्मरण भर जीऊ
ओर स्मरण
कहां आत्म चैन देता हैं
विरह की घनीभूत
गहराई भीतर
खो जाता मैं
किनारा कहां
मेरा अस्तित्व विलिन मत करो
अतीत
अन्तराल मेरा तुम्हारा
दिनोंदिन बढता हैं
बैचेन हूँ मैं
अन्तराल का बढ़ना
कसक टीस
गहरी करता हैं
ओर तुम
बार बार पल पल
छाया बने
जीते हो मुझे
पर मेरे जीने का
कोई तो ठोर हो
तुम्हें जीते ठोर कहां
तुम्हें छोड़े प्राण कहां
कसमकस कैसा दे गये
मेरे अपने अतीत
दिव्यता लाऊ कैसे
कि तुम न आओ
सूक्ष्म बन
ओर मैं तुम्हारी स्मृति बिना
साँस ले सकूँ
पराजित हुआ जीवन मेरा
अदृश्य के हाथों
अतीत विनय तुम्हें ही
तुम्हें ही करता हूँ
अतीत अब जाओ ना।
छगनलाल गर्ग।


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