भरे नेह भंवर भार हृदय तेरे
घने विवर विडोलित पवन पछारे
मौन मनन मूक मंथर मस्तिष्क मंथन मन मित करे
नेह उन्माद अति तीव्र हलचल मचलती कमनीय राग झरे
शब्द नहीं रे स्वर सा लय विलय सृष्टि समष्टि बन अंग रौमाच भरे
आह।यह मुख मादक चितवन तंरग मदन मार मरे
खिलती नवल कली हास्य अलौकिक चित अर्पित करे
अब अवलम्ब अधर राग अमंद रस पान केवल मन भरे
मलयज गंध मस्तिष्क मन हिलोर अति अस्तित्व हरे
पल नहीं रे जीवन सम्पूर्ण मेरा बस यही नहीं अवशेष हैं नहीं
रे जीवन कह तू जिया घनेरा क्या कभी ऐसे नेह नीर नहाया नहीं ।
छगन लाल गर्ग।
घने विवर विडोलित पवन पछारे
मौन मनन मूक मंथर मस्तिष्क मंथन मन मित करे
नेह उन्माद अति तीव्र हलचल मचलती कमनीय राग झरे
शब्द नहीं रे स्वर सा लय विलय सृष्टि समष्टि बन अंग रौमाच भरे
आह।यह मुख मादक चितवन तंरग मदन मार मरे
खिलती नवल कली हास्य अलौकिक चित अर्पित करे
अब अवलम्ब अधर राग अमंद रस पान केवल मन भरे
मलयज गंध मस्तिष्क मन हिलोर अति अस्तित्व हरे
पल नहीं रे जीवन सम्पूर्ण मेरा बस यही नहीं अवशेष हैं नहीं
रे जीवन कह तू जिया घनेरा क्या कभी ऐसे नेह नीर नहाया नहीं ।
छगन लाल गर्ग।
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