तेरे हरे भरे पते
घनी छाया के पूण्ज
आज नहीं हैं
मेरे स्वीकृति से
काटे गये
कसूर तेरा इतना सा
कि पक्के पते तेरे
आगन भरते
कचरा बन जाते
सार हीन
गन्दगी का अम्बार बने बने
पैरों तले कूचले जाते
ओर शिकायते लाते
पड़ोसियों की
आपके पते उड उड आते
गन्दला करते नित
हमारा ऑगन
उधर पत्नी का ताना
सफाई का बहाना
नित का झमेला रहता
नीम मुझे निर्मम मत कहना
विवश था मैं
आज तुम रूप हीन
शोभा हीन बने
तो कारण मात्र मैं ही
मैं ही हूँ
सारे एहसास भूला सा
मतलबी हूँ मैं
भीषण धूप के
साथी मेरे
तेरी छाया तले
कितना शुकून पाया मैंने
खुद प्रखर धूप झेल
तू ठंडक देता रहा मुझे
ओर मैं
भीषण कुल्हाडी की धार से
खुली ऑखो से
प्रहार
कितना क्रूर बना हैं मेरा व्यक्तित्व
अभी अभी देखा एक बार
इस रूप तुझे
कहां शिकायत तेरी
खण्डित हुआ भी
तेरी वहीं मुस्कान
दर्द नहीं सालता तुझे
पत्नी ने तेरी कटी लकडियो का ढेर
सलिके जमाया हैं
यह कहते
घने जाडे मे आग जला
ठंडी हटायेगे
ओर पते
मच्छरो से बचने
रोज आग जलते
धुआँ बन सारे माहोल को
मच्छरो विहीन करते
मेरे आधार सुख
तुम फिर पल्लवित होना
इसी तरह
छाया बनना
जीवन की मेरे
काश।मानव
तेरे इस बलिदान से कुछ
सिख लेता
अंश मात्र ही
तो यह जग जीवन
पारस्परिक छाया से
कितना सुंदर
कितना हमदर्द
कितना त्यागी
मानव बन जाता ।
छगन लाल गर्ग।
घनी छाया के पूण्ज
आज नहीं हैं
मेरे स्वीकृति से
काटे गये
कसूर तेरा इतना सा
कि पक्के पते तेरे
आगन भरते
कचरा बन जाते
सार हीन
गन्दगी का अम्बार बने बने
पैरों तले कूचले जाते
ओर शिकायते लाते
पड़ोसियों की
आपके पते उड उड आते
गन्दला करते नित
हमारा ऑगन
उधर पत्नी का ताना
सफाई का बहाना
नित का झमेला रहता
नीम मुझे निर्मम मत कहना
विवश था मैं
आज तुम रूप हीन
शोभा हीन बने
तो कारण मात्र मैं ही
मैं ही हूँ
सारे एहसास भूला सा
मतलबी हूँ मैं
भीषण धूप के
साथी मेरे
तेरी छाया तले
कितना शुकून पाया मैंने
खुद प्रखर धूप झेल
तू ठंडक देता रहा मुझे
ओर मैं
भीषण कुल्हाडी की धार से
खुली ऑखो से
प्रहार
कितना क्रूर बना हैं मेरा व्यक्तित्व
अभी अभी देखा एक बार
इस रूप तुझे
कहां शिकायत तेरी
खण्डित हुआ भी
तेरी वहीं मुस्कान
दर्द नहीं सालता तुझे
पत्नी ने तेरी कटी लकडियो का ढेर
सलिके जमाया हैं
यह कहते
घने जाडे मे आग जला
ठंडी हटायेगे
ओर पते
मच्छरो से बचने
रोज आग जलते
धुआँ बन सारे माहोल को
मच्छरो विहीन करते
मेरे आधार सुख
तुम फिर पल्लवित होना
इसी तरह
छाया बनना
जीवन की मेरे
काश।मानव
तेरे इस बलिदान से कुछ
सिख लेता
अंश मात्र ही
तो यह जग जीवन
पारस्परिक छाया से
कितना सुंदर
कितना हमदर्द
कितना त्यागी
मानव बन जाता ।
छगन लाल गर्ग।
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