Thursday, 8 October 2015

वीणा तेरी तरंग मेरी ।

आशक्त हूँ मैं
स्वर लहरिया भाती हैं
बजने दो
प्राण राग छलकने दो
कि थोड़ा नहा लू स्वर गंगा
धारा बहने दो
कहां आता मुझे
वीणा बजाऊ
तार कहां
कंपन कैसे हो
फिर कांपती हैं
सधी कहां अंगुलिया मेरी
बस पास आऊ थोड़ा
बैठने दो
आशक्त मुग्ध सा
नहा लू संपूर्ण अस्तित्व लिए
विलय हो जाने दो
अबाध निरन्तर
कि मैं तनिक न बचू
एक रस होने दो
वीणा तुम्हारी तुम्हे लिए
बस जाये प्राण मेरे
कंपन उठे भीतर
तुम्हारी
तंरगित सस्वर
कहां आदान प्रदान
कहां दृश्य बनाना हमें
भीतर भीतर तेरे प्राण राग
कंपे
वहीं कंपन मेरी बन जाये
वीणा
रहे तेरी
पर राग रागिनी
कंपित तंरगे गूँजे
भीतर भीतर
मेरी
मेरे प्राण
मूक स्वरो की यह
पुकार सुनो।।
छगन लाल गर्ग।

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