Friday, 23 October 2015

देते रहो तपन मेरे ।

स्मृति अब भार भारी
 विकल हूँ अतिधार तेरी
प्राण पीघल तपन तार होकर
 घुल पीडा की राख काली
पवन बन तप्त जहान करती
चेतना शिथिल होकर
 प्राण रहते निष्प्राण करती
बस कर रे नेह अब तू
कसक बीच जीवन सार कह तू
नीरव राग भी कलंकित होता
 अवसाद मिलता अंधकार आता
जग सुख का अब सार थोथा
नेह का ही कसक पीर भाया
ताप रे मनमीत मुझको
वेदना ही अब सार देती
झेल पीडा कसक तेरी निखरते अब प्राण मेरे
बन चुका रे प्रेम भी अब
निखर निखर पावन हुआ कंचन
नेह बना अहोभाव अब तो प्रार्थना के राग देता
मिलन का अब क्या करू प्रिय देते रहो तपन मेरे ।
छगन लाल गर्ग।


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