Saturday, 24 October 2015

अनन्त यात्रा

यह पुलिया नदी से उपर उठा मुझे अवसर देता
कि बिना संघर्ष पानी नदी पार करू
किनारा पाये आगे बढू मंजिल की ओर
निगाहे उठा देखता हूँ गहराई ओर विस्तार पाया बहता नीर
बढता जाता गतिमय मंजिल की ओर
बेबाध हैं देखता हूँ भागता हुआ अभी अभी
समय ओर सभ्यता सुनता हूँ बाधक होती उसके सपनो मे
प्रखर ताप सोखता जाता जीवन उसका
ओर इन्सान रोकता जाता अपनी गरज बान्ध बनाकर
अंश ही पाता मंजिल सागर विलय
फिर देखता मेरा जीवन मोहताज बना ओरो का पग पग सरकता ऐ

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