Sunday, 1 November 2015

कहता रहूँगा ।

कहता रहूँगा
बिना ताजगी जर्जर मन तन लिए
चिर सत्य
समय की धार काटती नही
अशक्त रह जाती
कटे कहां सत्य
फिर फिर नये नये रूपों मे
घेरते जाते समूचा व्यक्तित्व मेरा
उम्र कहां रही की सत्य पछाडू
जैसे कि आज होता हैं
सत्य पछाडे जातेहैं झूठ के बल
यह कैसे होगा सामर्थ्य कहां इतना मेरा
कैसे हो विजेता होने का दावा
नये शब्दों के अवतार के साथ
बोलता हूँ शब्दों को
जो कई बार जुबान घसीटे गये हैं मेरे
ओर औरो के द्वारा भी
ताजगी कहां रह गयी मेरी तरह
शब्द ओर उसका प्रभाव समझे
कि उम्र गुजरती सी हैं
ताजी मुट्ठी भर हवा को तरसती
सरकती फिसलती रैगती जिन्दगी मेरी
हकीकत हूँ मैं समय की मार का
एक निछोडे निम्बू सा सत्य
कीमत हीन फिर भी खटास देता हूँ
सत्य की
कि किसी के नेह देह रूपी बर्तन मझे
चमके ओर निखर निखर जाय
पावन सार्थक मनुष्य बने
जग रोशन करे।
छगन लाल गर्ग।

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