छुआ कहां तुमने
बिखरे बिखरे से मेरे मन
अंश तुम्हारा धूमिल हुआ
गहरे विषाद से
भाग भाग आसरा चाहो ओरो का
बिखरना तुम्हारा
बेहोशी देता हैं
गहरे तल से
जहाँ चेतना के दीये जलते
कभी टिमटिमाते से लगते
देखते हो तुम मेरे मन
थोड़ी दृष्टि भीतर तो करो
शायद विषाद तुम्हारा रोशनी पाये
ओरो की आस खरी उतरे
कैसे मानू
बिखर बिखर मिटता जाता
बिम्ब तुम्हारा
घने दर्द को क्या
छुआ कहां तुमने।
छगन लाल गर्ग।
बिखरे बिखरे से मेरे मन
अंश तुम्हारा धूमिल हुआ
गहरे विषाद से
भाग भाग आसरा चाहो ओरो का
बिखरना तुम्हारा
बेहोशी देता हैं
गहरे तल से
जहाँ चेतना के दीये जलते
कभी टिमटिमाते से लगते
देखते हो तुम मेरे मन
थोड़ी दृष्टि भीतर तो करो
शायद विषाद तुम्हारा रोशनी पाये
ओरो की आस खरी उतरे
कैसे मानू
बिखर बिखर मिटता जाता
बिम्ब तुम्हारा
घने दर्द को क्या
छुआ कहां तुमने।
छगन लाल गर्ग।
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