जीवन हाँ यह तेरा कैसा रूप।
होता नहीं तनिक मन अनुरूप ।
सोचा करते आनन्द स्वरूप।
हो जाता अति विषम कुरूप।।
क्या यही तू स्वीकार निसन्देह।
या कि तेरा अन्य फल सुखदेह।
संचय गया कहां थक चुकी देह।
प्राण रहे रीते सूना पड़ा तन गेह।।
कहू अति मन मोहक भी।
रहू नित चित विस्मृतभी।
बनू मैं नित नव मादक भी।
चाहू गगन सम गरिमा भी।।
रहू विमल सहृदय भी।
रहू पावन निर्लिप्त भी।
डरू पापमय पथ भी।
करू पुण्यमय कर्म भी।।
भावना केवल भाव ही रहे।
निष्क्रियता का भार न रहे।
कामना कर्ममय धरातल बहे।
परहित समर्पित जीवन रहे।।
छगनलाल गर्ग।
होता नहीं तनिक मन अनुरूप ।
सोचा करते आनन्द स्वरूप।
हो जाता अति विषम कुरूप।।
क्या यही तू स्वीकार निसन्देह।
या कि तेरा अन्य फल सुखदेह।
संचय गया कहां थक चुकी देह।
प्राण रहे रीते सूना पड़ा तन गेह।।
कहू अति मन मोहक भी।
रहू नित चित विस्मृतभी।
बनू मैं नित नव मादक भी।
चाहू गगन सम गरिमा भी।।
रहू विमल सहृदय भी।
रहू पावन निर्लिप्त भी।
डरू पापमय पथ भी।
करू पुण्यमय कर्म भी।।
भावना केवल भाव ही रहे।
निष्क्रियता का भार न रहे।
कामना कर्ममय धरातल बहे।
परहित समर्पित जीवन रहे।।
छगनलाल गर्ग।
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