Saturday, 10 October 2015

सिमटती छाया।

सिमटती छाया
नीम की मूल का घेरा
तने के एक तरफा आ गया हैं
हाँ फैलाव का कम होना
सघनता देता हैं
सरकता हूँ
तने की ओर
जडे बाहर उभरी हैं
ऊँची जड बैठक बनी हैं मेरी
अब ठीक
साँस छूटती हैं मेरी
निश्छल एकाग्र हुआ
मंदिर दर्शनार्थियो की आस्था
निहारता हूँ
भीड़ रहती हैं
शनिवार हनुमान जी
का दिन हैं
मैं मन ही मन
पुनः श्रृद्धा भक्ति से
नमन करने लगता हूँ
छाया घटती जाती हैं
मैं उसके ओर करीब
तने से सट गया हूँ
पर कब तक बैठ पाऊगा
सोचता हूँ
मंथन भीतर को छूता हैं
यह जीवन
ठीक ऐसे ही
सिमटी छाया बना हैं
उतरार्द्ध जीवन मेरा
ओर ठीक इसी तरह
छाया बना सिमट रहा हैं
प्रखर धूप
तन सेकने लगी हैं
मंदिर की तरफ देखता हूँ
आध्यात्मिक ऊर्जा
अनुभव करता करता
उठ जाता हूँ
वहीं से दण्डवत नमन
कर कड़ी धूप  सहेजे
छाया की चाह मे
बढता हूँ  आगे
मेरे सृजक
छाया धूप के इस तेरे
खेल मे
मैं अब हारा पात्र हूँ
अभिनय खूब हुआ
तन ओर मन
विश्रान्ति की शीतल
बयार चाहे
जहाँ केवल मैं
ओर तू रहे
प्राण राग जुड़े
महाराग मे विलय
हो जाय।
छगन लाल गर्ग।

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