Wednesday, 7 October 2015

आहत क्षण ।

जीवन यह हैं तेरा कैसा रूप
होता नहीं  कहां मन अनुरूप
सोचा करते आनन्द स्वरूप
हो जाता अति विषम कुरूप।
क्या यही जीवन तुझे  स्वीकारू निसन्देह
या कि हैं कोई तेरा अन्य फल भी सुखदेह
अभी संचय गया नहीं पर थक चुकी देह
प्राण अभी तक रहे रीते सुना पड़ा तन गेह।
कहू अति मनमोहक भी
रहू चित रंग विस्मृत भी
बनू नित नव मादक भी
चाहू गगन सम गरिमा भी।
रहू विमल चित सहृदय भी
चलू पावन ओर निर्लिप्त भी
डरू घना  पापमय पथ भी
करू नित पुण्यमय कर्म भी।
भावना केवल भाव ही न रहे
निष्क्रियता जीवन भार न रहे
कामना कर्म मय धरातल बहे
परहित ही समर्पित जीवन रहे।
प्राण तार टूटा टुकड़े हैं तडप भारी
घिर चुके प्रचण्ड दर्द अनुताप जारी
राह मिले कहां जीना कैसे भंवर भारी
करवट ले कैसे शिकंजा कसा हैं भारी।।
हाल हैं हताश हुए हारा हृदय हैं हिमम्त होगी कहां से
मेरे निकट हैं शौर शराबा पर चित छा गया सन्नाटे से
पास हैं भीड़ भारी निर्ममता से रौदती अरमान दिल से
चेतना थक चुकी हैं मूदती ऑखे मोहित होती प्राण से।।
चाह अब केवल सिमट कर आस्थामय हो गयी हैं
जग प्रलोभन तुच्छ होकर ऑख औझल हो गये हैं
कामना का राज शास्वत चमक से मंथरा गया हैं
सुंदर सलोने साज सारे झूठे भ्रामक हो गये हैं ।
नहीं हैं हमदर्द कोई संताप बाँटे सुख मिले
हैं गहरा अंधकार कैसे हृदय ज्यौति खिले
आसरा अब देह माँगे बेसहारा मृत्यु मिले
अपने कहू किसे सब अपने ही बेवफा मिले ।
जाऊ कहां कोई कहे जहाँ जीवन राग पाऊ
लाऊ कहां से माँग कर किरण उजाला पाऊ
उठाऊ कैसे बौझ सारा भार दबता ही जाऊ
हादसा जीवन बना हैं सुरक्षा कहां से लाऊ।
पीर उमडती प्रेम की निर्मल छाँव भी होती हैं क्या
नीर डूबे देह मे भी प्राण की रहे कुछ आस भी क्या
चीर छाती देखता रहा हूँ तृप्ति का अहसास हैं क्या
गिर कीचड़ दागित देह ले ढूँढता देह बेदाग हैं क्या ।
रास्ते सारे लगते बेढंगे राहगीर राह चलेगा कैसे
डालते हैं जाल मायावी फसता मुसाफिर फिर से
ओर होकर संग मे नित जाम चखता मादकता से
जर्जर छोडती माया तब चिखता रूदन स्वर से।।
हाहाकार रूदन क्रदन संसार यही पहचान तेरी
झूठ मूठ की लावण्यता जो चित लुभाये रे बेरी
ऑख मूदे सपने सी तृष्णा घेरे जीवन माया नगरी
बार बार फसता जी जान मिटी नहीं जडता मेरी ।
सपने बनाते अपने अगर निन्द होती गहरी
करते रहते कर्म भी अगर दर्द न होते प्रहरी
लडते बनते लायक भी रहती शक्ति ठहरी
मर्म भी कहते अगर सुन लेती दुनिया बहरी।
आज का पल कल का ताना बाना बुनता हैं कहते हैं
पल पकड ले गया वक्त वापस नहीं आता हैं कहते हैं
सच्चा बन सच्चाई की हमेशा जीत होती हैं कहते हैं
सुना किया वक्त से दगा मिला क्या झूठ ही कहते हैं ।
शायद कथन न हो झूठ हम ही झूठे हो
शायद लायक न हो हम कर्म ढीले हो
लगता हैं मालिक समर्थ को ही देता हो
शायद माफिक वक्त के हम नही रहे हो ।
घृणा से गुजरा जीवन शब्दों तक पहुँचा तो हैं
जग के मेहनतकस का भाव थोड़ा पलटा तो हैं
प्रजातंत्र हाफते ही सही अंजाम तक लाया तो हैं
इस मजदूर कौम का संघर्ष कुछ भाव पाया तो है।
छगनलाल गर्ग।



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