Sunday, 11 October 2015

प्रेमी चला गया ।

कई चाँद अंधेरे को
 रोशन किये
ओर चले गये
कई सूरज उगे
ओर डूबे
प्रेमी ने कब
फिकर की मेरी
मैं अनन्त मे
ऑखे उठाये मेरे प्रेमी
नित निहारू तुझे
चमकते तारो बीच
अंधेरे को चिरती चाँदनी
की छितराई आभा बीच
भ्रम घनीभूत हुआ
आकार पाता तुम्हारा
हाँ ।तुम्ही तुम्ही
ऑसूओ की सघनता बीच
कभी कभार खो खो जाते तुम
भ्रम धोखा दे जाता
फिर कहां दिखते तुम
गर्म आह ले ले
बार बार बुलाता जाता
पर तुम सुनो तब ना
प्रेमी मेरे
फिकर कहां तुम्हें मेरी
दस्तक तो दिल मे
देते तुम हर पल
छाया ही तुम्हारा
झलक तो दो मुझे
शायद सहारा बना सकू
जीने लायक
दिल का घर मेरा
संकरा घना हैं
तेरे रहते
हालाँकि तुम अप्रकट आते हो
पर रहते यही
ओरो को बसाऊ कहाँ
मेरा तुम्हारा
यह भीतरी राग
मिटे भी तो कैसे
तुम हो
छिपे छिपे आते हो
परदा रखते तुम
सबसे
घूघट का परदा
दुनिया नहीं देखती
ओर ऐतबार करती
मेरे अकेलेपन का
पर हूँ क्या अकेले
ख्यालो मे कहां
छोडते मुझे अकेला
अब ओरो का क्या हो
सोचे कि मेरा
प्रेमी चला गया।
छगन लाल गर्ग।






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