Tuesday, 6 October 2015

समझ आती नहीं ।

क्रिया की सीमा
थकान पर ठहरती हैं
साँस लेती दो घड़ी
अहसास पाती काम का
सन्तोष तनिक आता
पर काम का अधूरापन
खलता हैं
यह बाकीपन
जिन्दगी साथ साथ
अबाध चलता हैं
शायद कोई सरकारी दफ्तर हैं
बाहर देहरी बनी चिढिया
मेरी साथी बनी हैं
सड़क से फासला बनाये
पेढी पर बैठा हूँ
निगाहे बोर्ड पर लिखे
शब्दों पर जाती हैं
सहकारी मीनी बैंक
का लेबल
भीतर की सफाई वाली
बाई बाहर आती हैं
बाबूजी उठो
कहीं ओर बेठो
सफाई करनी हैं
उठता हूँ अचकचाया सा
बढता हूँ आगे
नव निर्माण होता
देखता हूँ
भवन कई मंजिला
विशाल भवनो की गहराई छाया
मुझे छूती हैं
पर तभी रूकता हूँ
भिगार लेने वाले ओर
मकान रखवाली
चौकीदार बीच झडप
होते देखता हूँ
लोहे के बचे सरिये बेचता
चौकीदार
चिल्लाता कहता
बेईमान तोल मे गड़बडी
करता हैं
पूरे बीस किलो हैं
किलो कम क्यों बताता
गिडगिडाता हैं
भिगार वाला
साहब भाव भी तो
ओरो से ज्यादा देता हू
मेहनत से पेट पालता साहब
मैं बढता हूँ
समझ कहां पाया
बेईमान चोर
चौकीदार
या कि भिगार लेने वाला
जिन्दगी तूझे खूब जिया
पर समझ हैं कि
आती नहीं ।
छगनलाल गर्ग।






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