Tuesday, 6 October 2015

मोहपाश तेरा।

मोह पाश बना श्रृगार तेरा
चित चेतना का राज मेरा
राग भरा मृदुल गान मेरा
भाव सज्जित संसार मेरा।
       रूप तेरा चाँदनी की सुखद ठंडक छाया घनी हैं
        नयन चितवन तीर बनकर चित को चिरती हैं
        अंचल सरकता पवन संग तंरग सा डोलता हैं
       बैसुध होकर राग सारे चंचल चित मचलते हैं ।
रात की चटकती चाँदनी तुम
गात का मदहोश जाम हो तुम
बात मीठी रसधार बहती तुम
पात बैठी अंगूर की गाँठ हो तुम ।
        भावना की धार चित उठती
         ऑधी बनी अब भीतर उडती
         भरे बादलो का रूप उमडती
         घनी वासना तन फोड फूटती।
धारा रसमय बहने लग गयी हैं
मार मदन की तन मे लग गयी हैं
विलय से तन मन आनंद भरा हैं
दिव्य राग लहरी भीतर बहता हैं ।।

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