Monday, 12 October 2015

जैसा हूँ रहने दो।

रहा नहीं जाता अब
कह ही दू
भीतर भार बढ़ता हैं
जैसा हूँ वैसा ही रहने दो
मेरे व्यक्तित्व की
ऐचतान मत करो
तुम भरना चाहते
मुझे
अपार गुणों से
पर क्या यह ठीक होगा
स्वाभाविकता मेरी
झुठलाओगे कैसे
सम्भव नहीं मित्र मेरे
विजातिय भाव
कैसे पायेगे भीतर स्थान
केवल ऊपर ऊपर
अपनाना बनावट होगी
स्वाभाविक ही रहने दो
प्रयोजन जीवन
यह तो नहीं मित्र
मैं जैसा हूँ काफी हूँ
उल्टा सीधा करते मुझे
यह अर्थ हीन हैं
ओर उलझ जाऊँगा मैं
क्यों उलझाते हो
म्रमित हुआ
स्वत्व खोये
कैसे जी पाऊगा मैं
रहने दो यह बनावट
सीख बनावट तुम्हारी
जीवन नद को
गंदला कर देगी
अभी नद नीर गंदला
हैं कहां
स्वच्छ हैं प्रकृति
गंदे पेर न सही तुम्हारे
साफ पैरो से भी
मेरे जीवन की
नद धारा मे
मत घुसो
पैरो की हलचल मात्र
मेरे स्वच्छ नीर को
गंदला कर ही देगी
जैसे वासना का उफान
चित आते ही
गंदा कर जाता हैं
ठहरो थोड़ा सा
तुम आये चलो माना
अब नाता तोडो
मूल शात्विक स्वभाव
रहने दो
वास्तविकता हैं यह
बाकी धुन्ध बनावट की
बिना प्रयास छंटने दो।
छगन लाल गर्ग।

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