अब कहना
विवशता हैं मेरी
एक बादलो की परत हटी हैं
आच्छादित धुँध का फैलाव
भौथरा गया हैं
विलुप्त रश्मियो का बिखराव
जड जंगम को नहाता
मुझ तक पहुँचा हैं
प्राण तंरगे
रश्मि तंरगो से
अवगुण्ठित होती
कंपित सा हैं अस्तित्व मेरा
तल जमा भीतर
भाव जली धूमिल कालिमा
सरकती सी महसूस करता हूँ
अदृश्य सी
विलोपित होती होती
चेतन प्राण
कसक देते हैं
उजास का भीतरी चेहरा
बिम्ब बना दोहराता हैं
मुझे
स्नेह घेरा तन मन बाँधने
लगता हैं
एक अलौकिक नेह निर्झर
तले सर्वाग विलय हुआ
नहाता हूँ
भाव संसार का हमराग हुआ सा
मौन विरान सन्नाटा
बाहर बाहर
भीतरी सौन्दर्य का मात्र
मेरा चित हैं अंश
यह दशा
खुद से खुद मे खोयी
बडा जटिल हैं शब्दाकार देना
केवल पकड आती हैं
बाँधता जाता
अनुभूत करता हूँ तुझे
यही तो दूरी बनाते
शब्द तुम
कहां आते तुम
कितने दिन ओर
जीवन रहते
फक्त एक बार तो आना
शब्दों तुम
कि मैं कह पाऊ मेरा
लौकिक परलौकिक सत्य
अन्यथा
न जाने कितने हृदय
अछूते रह जायेगे
दर्द का दरिया शान्त होगा कैसे
आना भी
रूलाना मत अब
अब जीवन तो हैं
पर तुम्हारे लिए
अजनबी हूँ मैं ।
छगनलाल गर्ग।
विवशता हैं मेरी
एक बादलो की परत हटी हैं
आच्छादित धुँध का फैलाव
भौथरा गया हैं
विलुप्त रश्मियो का बिखराव
जड जंगम को नहाता
मुझ तक पहुँचा हैं
प्राण तंरगे
रश्मि तंरगो से
अवगुण्ठित होती
कंपित सा हैं अस्तित्व मेरा
तल जमा भीतर
भाव जली धूमिल कालिमा
सरकती सी महसूस करता हूँ
अदृश्य सी
विलोपित होती होती
चेतन प्राण
कसक देते हैं
उजास का भीतरी चेहरा
बिम्ब बना दोहराता हैं
मुझे
स्नेह घेरा तन मन बाँधने
लगता हैं
एक अलौकिक नेह निर्झर
तले सर्वाग विलय हुआ
नहाता हूँ
भाव संसार का हमराग हुआ सा
मौन विरान सन्नाटा
बाहर बाहर
भीतरी सौन्दर्य का मात्र
मेरा चित हैं अंश
यह दशा
खुद से खुद मे खोयी
बडा जटिल हैं शब्दाकार देना
केवल पकड आती हैं
बाँधता जाता
अनुभूत करता हूँ तुझे
यही तो दूरी बनाते
शब्द तुम
कहां आते तुम
कितने दिन ओर
जीवन रहते
फक्त एक बार तो आना
शब्दों तुम
कि मैं कह पाऊ मेरा
लौकिक परलौकिक सत्य
अन्यथा
न जाने कितने हृदय
अछूते रह जायेगे
दर्द का दरिया शान्त होगा कैसे
आना भी
रूलाना मत अब
अब जीवन तो हैं
पर तुम्हारे लिए
अजनबी हूँ मैं ।
छगनलाल गर्ग।
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