Monday, 5 October 2015

भिगो देती हो।

भार कितना ओर बाकी
हृदय हारा रे अब साथी
भरा घना पर प्राण बाकी
अंधकार केवल मेरा साथी।
रोशनी कैसी मेरे जीवन
दीया जले पर प्राण रीते
चेतना नित भार उपवन
विरह जलजात चित बीते।
तन बना प्रपात सा यह
झरे नित यह रीत रहता
भाव हैं थके थके विरह
शिथिल बने हृदय रोता।
मुस्कराते तुम खड़े हो
तीर छवि बन प्राण लेगी
झुझलाते पीर देते हो
उष्मा तपन ही जला देगी।
निर्झर सा हैं जोश तुम्हारा
अधो प्रवाह बहे ऑधी सा
जाल भंवर फस ढूँढू सहारा
नेह डूबा खोजे तिनका सा।
आह।री वेदना तुम भी क्या
चुपके चुपके आती हो
वाह ।रे जीवन तुम भी क्या
रूप नया दिखलाते हो।
दुख विशाल हो सार हुआ हैं
जलन तपन का चित्र हुआ हैं
काल घिरा अभिशाप हुआ हैं
ईश वरदान का नाश हुआ हैं ।
कब तक  रहूँगा कैसे कह दू
बोल निरसता किसे सुना दू
व्याधि घनी  चित ही रख दू
भार मेरे तुझे खुद ही रख दू ।
नित दिन प्राण तुम विकल होते हो
प्रति पल जीवन हर्ष ढूँढते क्यों हो
सुने विवर तंरग टकराती क्यों हो
यादो चित शैल को भिगो देती हो।।
छगनलाल गर्ग।








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