जीवन तुम हो एक अनुभूति हो
जिसे मैं महसूस करता प्रतिदिन स्पन्दन देते हो
लेता तभी तभी मैं गति तुम्हें महसूस करता
धड़कने धक् धक् करती सी ओर मैं सोचता चलती हो तुम
ओर मैं महसूस करता अपना जीना नाम देता जिन्दगी
फिर चलता फिरता मरजी का जहाँ मन हो निकल जाता
फिर बोलता भी हूँ कभी सार्थक अर्थ समझती दुनिया
कभी निरर्थक जिसका अर्थ महसूस होता केवल मुझे
थोड़ा सा अर्द्ध ही हाँ आधा पूरा कहां समझ पाया मैं
पर बोलता हूँ मैं मिलता क्या मुझे बोलते
कभी मीठास जिसे चाहा मैंने
कभी ताना जो सुनना कब अच्छा लगा मुझे
कभी तीखी प्रतिक्रिया मात्र जिसे कभी नहीं चाहा
पर यह सारा कुछ ऐसे ही थोड़े ही हुआ
जब कोई कहता कि विद्वान तुम पढ़ें लिखे अच्छे संस्कृत
कितना भाता काश ।ऐसा सुनना मिलता रहे
पर हर बार किसके पड़ी हैं बेवजह तारिफ कभी हुई किसी की
अरे बड़े बड़े गला फाड चिल्लाये तब सुना लोगों ने
अपनी हैसियत तो देखो अदने से
कभी खुद को देखा ठीक से खुद को
तुम देखते दुसरो को देखो खुद को पता लगे कितनी सुनते अपनी
अपेक्षाऐ तुम्हारी अपने से नही दुसरो से हैं
तुम पूरे ठीक कसर हर किसी दुसरे मे हैं
इतना जाना कि तेरा एक ओर रूप भी हैं महत्वपूर्ण
जब होते अकेले विरान एकागी तब भयभीत होते हो अपने आप से
सुनापन बोध देता सा कहता सा
बताओ अपना एक काम किया ओर भूले हो खुद को
ओर हुए एकराग एकरस एकदर्द एकतन कि मैं का कहीं अस्तित्व न हो
ओर तुम भूले हो अपनी चेतना अपना जीवन मिटे मिटे से कि न मैं हूँ न तू हैं
न जग हैं न पृथ्वी न आकाश ना ब्रह्माण्ड का नामोनिशान
जहाँ कोई पद चिन्ह अपना पराया न हो यह दशा
जीवन मेरे क्या पाई कभी या कि होती हैं
होती हैं कब नहीं तो यह सोच क्या क्यों क्या चुप ही रहेगा
अनभिज्ञ बना दंभ जीता मात्र
विविक ज्ञान दर्शन चेतना प्रज्ञा विज्ञान नहीं पता कितने नाम देता तू
बडे अलौकिक अंलकारिक अब कहना भी क्या तेरा
समझदार बन चुप्पी साधता बुद्ध बना
शायदवाद गढता हूँ ।
छगन लाल गर्ग।
जिसे मैं महसूस करता प्रतिदिन स्पन्दन देते हो
लेता तभी तभी मैं गति तुम्हें महसूस करता
धड़कने धक् धक् करती सी ओर मैं सोचता चलती हो तुम
ओर मैं महसूस करता अपना जीना नाम देता जिन्दगी
फिर चलता फिरता मरजी का जहाँ मन हो निकल जाता
फिर बोलता भी हूँ कभी सार्थक अर्थ समझती दुनिया
कभी निरर्थक जिसका अर्थ महसूस होता केवल मुझे
थोड़ा सा अर्द्ध ही हाँ आधा पूरा कहां समझ पाया मैं
पर बोलता हूँ मैं मिलता क्या मुझे बोलते
कभी मीठास जिसे चाहा मैंने
कभी ताना जो सुनना कब अच्छा लगा मुझे
कभी तीखी प्रतिक्रिया मात्र जिसे कभी नहीं चाहा
पर यह सारा कुछ ऐसे ही थोड़े ही हुआ
जब कोई कहता कि विद्वान तुम पढ़ें लिखे अच्छे संस्कृत
कितना भाता काश ।ऐसा सुनना मिलता रहे
पर हर बार किसके पड़ी हैं बेवजह तारिफ कभी हुई किसी की
अरे बड़े बड़े गला फाड चिल्लाये तब सुना लोगों ने
अपनी हैसियत तो देखो अदने से
कभी खुद को देखा ठीक से खुद को
तुम देखते दुसरो को देखो खुद को पता लगे कितनी सुनते अपनी
अपेक्षाऐ तुम्हारी अपने से नही दुसरो से हैं
तुम पूरे ठीक कसर हर किसी दुसरे मे हैं
इतना जाना कि तेरा एक ओर रूप भी हैं महत्वपूर्ण
जब होते अकेले विरान एकागी तब भयभीत होते हो अपने आप से
सुनापन बोध देता सा कहता सा
बताओ अपना एक काम किया ओर भूले हो खुद को
ओर हुए एकराग एकरस एकदर्द एकतन कि मैं का कहीं अस्तित्व न हो
ओर तुम भूले हो अपनी चेतना अपना जीवन मिटे मिटे से कि न मैं हूँ न तू हैं
न जग हैं न पृथ्वी न आकाश ना ब्रह्माण्ड का नामोनिशान
जहाँ कोई पद चिन्ह अपना पराया न हो यह दशा
जीवन मेरे क्या पाई कभी या कि होती हैं
होती हैं कब नहीं तो यह सोच क्या क्यों क्या चुप ही रहेगा
अनभिज्ञ बना दंभ जीता मात्र
विविक ज्ञान दर्शन चेतना प्रज्ञा विज्ञान नहीं पता कितने नाम देता तू
बडे अलौकिक अंलकारिक अब कहना भी क्या तेरा
समझदार बन चुप्पी साधता बुद्ध बना
शायदवाद गढता हूँ ।
छगन लाल गर्ग।
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