अस्तित्व मेरे तू मंथन हुआ
भीतर बाहर का साक्षी हैं तू
मेरे तमाम कार्यो का शाश्वत आकलन
ओर करेगा कैसे
बाहर भीतर कहां मेल खाता तू
अब हूँ
इस पल
क्या वैसा हर माहोल मे
रह पाता हूँ
रहते तुम अपने आकार प्रकार को लिए
बाहर बाहर
पर भीतर तुम कैसे
अस्तित्व मेरे
क्या कहूँ
गाँठे घनी कैसे खोलू
एक खोलता तभी
दूसरी मे खुली गाँठ भी
उलझ जाती
विवश घना तेरा आपा
कैसे बताऊ
तेरी सौम्यता ताजुज्ब मे डालती मुझे
जब तुम बात करते अपनो से
मीठी मीठी
भाव भीनी
तुम्हारा यह रूप कहां पाता
जब होते दफ्तर
या कि किसी लाचार बैबश को
पाते आसरा माँगते
बिफर उठते
उग्र रूप देखा हैं मैंने
कैसे कर लेते सब
यह कलाबाजिया खूब रंग लाती
मेरे अस्तित्व
जब तुम्हें गरज हो
स्वार्थ साधने की
तुम्हारा विनयशीलता का
उद्धरण इतिहास मे कहां हैं
जो मैं पाता
जब तुम्हारा कर्मचारी
मानवीय भूल भी करता
कितने खूखार बन जाते तुम
ओर उसकी हारी बिमारी मे
नियमों का पिटारा
खोल खोल डराते
बडे कलाबाज हो
मेरे अस्तित्व
कितनी मासूमियत से
बीबी की फरमाइसो को
आत्मीयता गहरी पाले
आदेश समझ
वफादारी निभाते हो
तुम्हारा भीतर बाहर का
फासला
क्या कहू
समझ नहीं आता
शायद यही
जीवन जीने की कला हैं
जो भी हो
मंथन मेरा बढा हैं
विचार भारी बौझ
बने हैं ।
छगनलाल गर्ग।
भीतर बाहर का साक्षी हैं तू
मेरे तमाम कार्यो का शाश्वत आकलन
ओर करेगा कैसे
बाहर भीतर कहां मेल खाता तू
अब हूँ
इस पल
क्या वैसा हर माहोल मे
रह पाता हूँ
रहते तुम अपने आकार प्रकार को लिए
बाहर बाहर
पर भीतर तुम कैसे
अस्तित्व मेरे
क्या कहूँ
गाँठे घनी कैसे खोलू
एक खोलता तभी
दूसरी मे खुली गाँठ भी
उलझ जाती
विवश घना तेरा आपा
कैसे बताऊ
तेरी सौम्यता ताजुज्ब मे डालती मुझे
जब तुम बात करते अपनो से
मीठी मीठी
भाव भीनी
तुम्हारा यह रूप कहां पाता
जब होते दफ्तर
या कि किसी लाचार बैबश को
पाते आसरा माँगते
बिफर उठते
उग्र रूप देखा हैं मैंने
कैसे कर लेते सब
यह कलाबाजिया खूब रंग लाती
मेरे अस्तित्व
जब तुम्हें गरज हो
स्वार्थ साधने की
तुम्हारा विनयशीलता का
उद्धरण इतिहास मे कहां हैं
जो मैं पाता
जब तुम्हारा कर्मचारी
मानवीय भूल भी करता
कितने खूखार बन जाते तुम
ओर उसकी हारी बिमारी मे
नियमों का पिटारा
खोल खोल डराते
बडे कलाबाज हो
मेरे अस्तित्व
कितनी मासूमियत से
बीबी की फरमाइसो को
आत्मीयता गहरी पाले
आदेश समझ
वफादारी निभाते हो
तुम्हारा भीतर बाहर का
फासला
क्या कहू
समझ नहीं आता
शायद यही
जीवन जीने की कला हैं
जो भी हो
मंथन मेरा बढा हैं
विचार भारी बौझ
बने हैं ।
छगनलाल गर्ग।
No comments:
Post a Comment