दीया खाली हैं
दावा नहीं मेरा कि
भीतर उजाले हैं
झकझोरता उफान सा
बूझते अस्तित्व सा
टिमटिमा रहा हूँ
दीया खाली हैं
जलता तो रहा
पर बूझा बूझा सा
भावना हीन
सार्थक कहां रहा जलना
प्रकाश कहां पाया
फिर भी इतराता
हवा की लहर बनकर
कभी ऊँचा
कभी उठने की शेष्टा मे नीचा
जो हूँ नहीं
वहीं दिखाता
दीया खाली हैं भीतर
दावा नहीं मेरा कि
समाधिस्थ हूँ मै
या कि वीतरागी हूँ
भीतरी तंरगो का खेल
मेरा जीवन
विषम हुआ प्रश्न जीवन
दीया खाली भीतर
टिमटिमाता रोशनी भर
दावा मेरा इतना मात्र
हूँ अभी तो
मौजूद हूँ ।
छगनलाल गर्ग।
दावा नहीं मेरा कि
भीतर उजाले हैं
झकझोरता उफान सा
बूझते अस्तित्व सा
टिमटिमा रहा हूँ
दीया खाली हैं
जलता तो रहा
पर बूझा बूझा सा
भावना हीन
सार्थक कहां रहा जलना
प्रकाश कहां पाया
फिर भी इतराता
हवा की लहर बनकर
कभी ऊँचा
कभी उठने की शेष्टा मे नीचा
जो हूँ नहीं
वहीं दिखाता
दीया खाली हैं भीतर
दावा नहीं मेरा कि
समाधिस्थ हूँ मै
या कि वीतरागी हूँ
भीतरी तंरगो का खेल
मेरा जीवन
विषम हुआ प्रश्न जीवन
दीया खाली भीतर
टिमटिमाता रोशनी भर
दावा मेरा इतना मात्र
हूँ अभी तो
मौजूद हूँ ।
छगनलाल गर्ग।
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