Wednesday, 28 October 2015

सपाट चौराहा ।

रास्ते मंजिल के निर्धारण हैं
अक्सर भूल से बचते हैं हम
ओर पाते निर्धारित मंजिल
भटकाव नहीं रहा यात्री निश्चित हैं
रास्ते जानता हैं अपने
जहाँ पहुँचना मकसद उसका
फिर व्यवस्था भी हैं बसों की निश्चित जगह पाने को
कहीं परेशानी हैं क्या
शायद नहीं भीड़ को छोड़ कर
पर ऊपर नीचे जैसे तैसे सफर चलता अंजाम तक
सतही तौर पर सुचारु आवागमन
चौराहे का अगर कोई ठौर हैं तो
मात्र त्रासदी झेलता बेरोजगार
जिसकी सारी मंजिले ढह गई हैं
न कोई रास्ता किसी मंजिल का हैं न निर्माणा धीन हैं
न बस हैं न रास्ता निगाहो के सामने बीहड घना
जहाँ जोखिम जिन्दगी हर रोज घने बीहड मे गुम होती हैं
चौराहे बसे व यात्री भी पर चौराहा यह सपाट हुआ हैं
बेरोजगारो के लिए जिनकी न किसी को परवाह
ओर न बेरोजगारो मे चेतना
कि जल उठे चिगारी बन काम पाना अधिकार मेरा
समझे संघर्ष करे।

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