Friday, 6 November 2015

द्वार खोलो।

अंतर मेरे हारा थका
वापसी चाहता हूँ तेरे भीतर
अलगाव अन्तराल अब विलुप्त हुआ
पहुँचा तेरे द्वार जिसे छोड़ा कभी
तुम्हारी पुकार बार बार वापसी की
सुनी अनसुनी बार बार करता रहा
जीवन के उतराफाल्गुनी नक्षत्र आने तक
मैं ही हूँ अजनबी मत बनो
खोलो खटखटाता हूँ द्वार तेरे
भीचे भीचे लगते द्वार मुझे अब तेरे
जैसे युगों से मेरी चेतना के द्वार बंद हो
अब खड़ा हूँ मेरे चेतन के भीतर
अजनबी मेहमान की तरह पहचान खोये
सुनते हो आवाज मेरी जो कभी तेरी ही रही
आस बान्धे पुकारता हूँ चेतन मेरे
कि आवाज पहुँचे घुल मिल जाय भीतर तक
सामर्थ्य की सम्पूर्ण क्षमता लिए
क्रिया का समूचा बल लिए देता हूँ आवाज
कि बंद कपाट खुले चेतन जाग रश्मिया बिखरे
घने अंधकार का आदी जीवन मेरा
रसा बसा क्षणिक सुखो के काल्पनिक मोहपाश मे
भ्रामक रस सागर मे इतराया मदमार रहा
ओर टिमटिमाता रश्मि कतरा कल्पना के तिमिर भी
पर मैं हर बार बंद ऑखो परहेज करता रहा तुझसे
कभी ऑख खोले चाहा भी कि भीतरी कालिमा का आवेग
मेरे समूचे अस्तित्व को बहा ले चला अपनी गति
ओर यह अंधेरा निर्मल कोरे चित को दागित कर जीता रहा बार बार
वितृष्णा का हल्का सा तिनका अंधेरे चित टकराया कभी
यह चेतन दशा केवल आधी अधूरी रही
वासना झंझावत चेतन डूबा रहा गहन अंधेरे की कंद्राओ बीच
जहां डूबना मानव नियति हैं
मन प्राण जख्म पाये लौटा हूँ मेरे चेतन
क्या द्वार खोलोगे मना मत कर देना
अस्तित्व रहा कहां केवल विसर्जन चाहता हूँ
द्वार खोलो न अब यह देरी वेदना कसक बढाती हैं
सुनता हूँ बहुत दूर मंदिर के घंटों के स्वर घने हुए हैं
वातावरण एकरस एकलय एक राग हुआ हैं
प्रार्थना के स्वर भीतर से गूँज देते सृष्टि समाते हैं
विस्मृत हुआ हूँ मैं चेतन
क्या तुम ही हो।
छगन लाल गर्ग।

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