असल शब्दों की घनी बहुतेरी परतो मे हैं
अब कितनी उघाडे श्रम व्यर्थ हैं
इतने ढेर लगते परतो के
कि सत्य तो दूर कल्पना तक ढकती जाती घनी परतो बीच
विभिन्न आकार विभिन्न रंग रूप लिए सतरंगी दुनिया का भव्य स्वर्ग
इन परतो का मोहक अन्दाज अदाये आकर्षण
कोमल कमनीय कामनाओ का कंचन बना पारावार
उघाडते उघाडते मोहक अदाओ की भूल भूलैया के भंवर मे फसा
इठलाता झूमता मदमार मदमस्त होता विस्मृत भूला भूला सा
एक एक उघडी परत का गीत गाता मादकता भरा
ओर तृष्णा के बियाबन की हर ठौर भटकने का भ्रामक सुख चेतना देता
परते प्याज के छिलको सी बेतरबीन होती
ठीक वैसा वेसा मैं भी आकार प्रकार से निहारता ओर लेता रस
कुछ खटा कुछ तीखा ओर कभी कभी बेस्वाद पाता
कल्पना भावना मीठास अहसास सौन्दर्य कोमल कमनीयता अब क्या कहूँ
कवि सुझाये सारे नाम प्यारी सी परतो को अर्पित करता
सब स्वाद चखा चखाया सुख का अहसास करता
केवल एक टीस रहती परते जिन्दगी खूब देखी तेरी
हर एक छिलका भोगा भाया
पर भीतर पाया तो नही तलाश पूरी उम्र गयी
शब्दों ओर सौन्दर्य मोहपाश का भंवर जाल
रहा फसा वहीं कोशिश असल की भूला भूला सा
मेरे कवि राग देते रहे तुम मेरी चेतना मे
सौन्दर्य खनक मोह माया का जिसमें रमते हो तुम
कल्पना के अंत हीन सागर मे
इस सागर की मात्र एक बूँद चखी मैंने
कि विस्मृत हुआ हूँ सत्य से असल से
कवि मेरे कहना पडेगा कल्पना सागर मे डूबना सिखाया तुमने
अन्यथा सत्य असल ढूँढ ही लेता
कास मेरे कवि तुम ना होते।
छगन लाल गर्ग।
अब कितनी उघाडे श्रम व्यर्थ हैं
इतने ढेर लगते परतो के
कि सत्य तो दूर कल्पना तक ढकती जाती घनी परतो बीच
विभिन्न आकार विभिन्न रंग रूप लिए सतरंगी दुनिया का भव्य स्वर्ग
इन परतो का मोहक अन्दाज अदाये आकर्षण
कोमल कमनीय कामनाओ का कंचन बना पारावार
उघाडते उघाडते मोहक अदाओ की भूल भूलैया के भंवर मे फसा
इठलाता झूमता मदमार मदमस्त होता विस्मृत भूला भूला सा
एक एक उघडी परत का गीत गाता मादकता भरा
ओर तृष्णा के बियाबन की हर ठौर भटकने का भ्रामक सुख चेतना देता
परते प्याज के छिलको सी बेतरबीन होती
ठीक वैसा वेसा मैं भी आकार प्रकार से निहारता ओर लेता रस
कुछ खटा कुछ तीखा ओर कभी कभी बेस्वाद पाता
कल्पना भावना मीठास अहसास सौन्दर्य कोमल कमनीयता अब क्या कहूँ
कवि सुझाये सारे नाम प्यारी सी परतो को अर्पित करता
सब स्वाद चखा चखाया सुख का अहसास करता
केवल एक टीस रहती परते जिन्दगी खूब देखी तेरी
हर एक छिलका भोगा भाया
पर भीतर पाया तो नही तलाश पूरी उम्र गयी
शब्दों ओर सौन्दर्य मोहपाश का भंवर जाल
रहा फसा वहीं कोशिश असल की भूला भूला सा
मेरे कवि राग देते रहे तुम मेरी चेतना मे
सौन्दर्य खनक मोह माया का जिसमें रमते हो तुम
कल्पना के अंत हीन सागर मे
इस सागर की मात्र एक बूँद चखी मैंने
कि विस्मृत हुआ हूँ सत्य से असल से
कवि मेरे कहना पडेगा कल्पना सागर मे डूबना सिखाया तुमने
अन्यथा सत्य असल ढूँढ ही लेता
कास मेरे कवि तुम ना होते।
छगन लाल गर्ग।
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