Tuesday, 3 November 2015

असमझ ही हैं यह।

असमझ ही कहूँ इसे
विकल दशा का अभ्यस्त हूँ घना
कशीश तौडती हैं भीतर ही भीतर
छटपटाहट रह रह कर अंकुरित होने का चाहती सुराख
कि कहीं बहाव हो
समतल जमीन मिले कि बहु विरल उफान नहीं मंथर मंथर तल
आद्र हो पाये निर्मल रस से
ओर सोखे मुझे अस्तित्व लेकर
यह धरा
कुछ नया जन्मे अंकुर ले
पल्ल्वित हुआ सा इठलाये मादक सुगंध लिए
कि फैल फैल जाए चारों दिशा
नव कुसुम सी सुगंधित पवन
मेरे संचित अनुभव लिए बहे
हवा से निखरे समा
जहाँ तमाम दर्द इकजाई हुए भरे झोली मेरी
ओर मैं बहु तपन का सार लिए जीऊ
यह वेदना जीवन नहीं भाव हैं प्राण हैं
जिसमें शक्ति भरी ब्रह्माण्ड संरचना की
पारमार्थिक शात्विक जीवन दायी
गहराई अनन्त हैं इस पीर पाये जीवन की
शब्दों की औकात थकी थकी
निरस विवश होती जीवन समेट पाये
सृजक मेरे
अभ्यास के अवसर तक सिमटा जीवन हमारा
अन्यथा हमारे सृजन सपने अधूरे अधूरे जीते कैसे
शब्दों का यह चमत्कार मात्र
बिना विकल दशा के बोझ ही होता
जिसे हम अनवरत डूबे बिना ढोते हैं
ढोते जाते हैं ।
छगन लाल गर्ग।



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