हर क्षण व्यस्तता मे सलंग्न
विश्राम विलग कर्मठ व्यक्तित्व
लिए सरकती हैं मेरी जिन्दगी
एक अहसास कर्ता का
हर पल संधर्ष को समर्पित
तपन ताप स्पर्श अनुभूति लेते
बितती जाती हैं मेरी जिन्दगी
कर्म जाल का निर्मम शिकंजा
घेरता हैं मुझे
होता हैं अहसास
यह जिन्दगी बन चुकी समस्या
पल पल लेने लगता
अपने रूप नये नये
जो होते अजनबी
बिना परिचय
करता जाता हूँ संघर्ष
कृत्य हूँ मैं
मेरा होना ही
समस्याओ को जन्म देता हैं
कर्मठ बनाती हैं
समस्याऐ मुझे
किनारे का दर्शक नहीं मैं
कि रूका रहू शैल बनकर
आमन्त्रण स्वीकारता
कूदता हूँ
समस्याओ के सागर मे
टकराव हैं मेरा
समस्या की लहरों से
कृत्य हूँ मैं
यह संघर्ष मेरे होने का
मेरे व्यक्तित्व निर्माण का
नहीं हैं नियोजित
स्वयं निर्माता हूँ मैं
अधिकार चाहता हूँ जीवन पर
अधीन रहे
हावी होना हैं हर समस्या पर
प्रयास यही मकसद यही
जिन्दगी का
प्रयासो पर समय का वार
अब घना भारी पाता हूँ
लडते हुए ससीम जीवन
ऊर्जा शिथिल पाता हूँ
लहरों का उन्माद
अधिक उन्मुक्त हुआ हैं
पर अंहकार बढ़ा हैं
कृत्य हूँ मैं
बड़ी अजीब जीजीविषा
पिघलती देह से बेपरवाह
लालसा का यह बिम्ब
मानव की पहचान का सत्य
बना हैं मेरा जीवन
हे चेतनता देख मुझे
घेर मुझे
विवश हुआ हूँ अब
कहना होगा
अकृत्य हूँ मैं ।
छगन लाल गर्ग।
विश्राम विलग कर्मठ व्यक्तित्व
लिए सरकती हैं मेरी जिन्दगी
एक अहसास कर्ता का
हर पल संधर्ष को समर्पित
तपन ताप स्पर्श अनुभूति लेते
बितती जाती हैं मेरी जिन्दगी
कर्म जाल का निर्मम शिकंजा
घेरता हैं मुझे
होता हैं अहसास
यह जिन्दगी बन चुकी समस्या
पल पल लेने लगता
अपने रूप नये नये
जो होते अजनबी
बिना परिचय
करता जाता हूँ संघर्ष
कृत्य हूँ मैं
मेरा होना ही
समस्याओ को जन्म देता हैं
कर्मठ बनाती हैं
समस्याऐ मुझे
किनारे का दर्शक नहीं मैं
कि रूका रहू शैल बनकर
आमन्त्रण स्वीकारता
कूदता हूँ
समस्याओ के सागर मे
टकराव हैं मेरा
समस्या की लहरों से
कृत्य हूँ मैं
यह संघर्ष मेरे होने का
मेरे व्यक्तित्व निर्माण का
नहीं हैं नियोजित
स्वयं निर्माता हूँ मैं
अधिकार चाहता हूँ जीवन पर
अधीन रहे
हावी होना हैं हर समस्या पर
प्रयास यही मकसद यही
जिन्दगी का
प्रयासो पर समय का वार
अब घना भारी पाता हूँ
लडते हुए ससीम जीवन
ऊर्जा शिथिल पाता हूँ
लहरों का उन्माद
अधिक उन्मुक्त हुआ हैं
पर अंहकार बढ़ा हैं
कृत्य हूँ मैं
बड़ी अजीब जीजीविषा
पिघलती देह से बेपरवाह
लालसा का यह बिम्ब
मानव की पहचान का सत्य
बना हैं मेरा जीवन
हे चेतनता देख मुझे
घेर मुझे
विवश हुआ हूँ अब
कहना होगा
अकृत्य हूँ मैं ।
छगन लाल गर्ग।
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