Saturday, 14 November 2015

मेरा कब रहा।

नहीं पाया आज तक
पूर्णता का अहसास
खालीपन जडता का
खोखला हूँ वृक्ष
टहनी ओर पत्तों का हरापन
बनावट की आभा
यान्त्रिक खरीदी हुई
हृदय सागर उथला शुष्क
चटखती मिट्टी की घनी दरारे
विभक्त करती जाती
नित प्रखर भाव तपन विखण्डित
हृदय मेरा
अतृप्ति का सुखा सागर
भ्रमित विवेक तलाशता जाता
रस जीवन
नव ऊर्जा प्रकृति दान
प्रातः ताजगी रश्मि लेता हुआ
पाना चाहता हूँ संचय सुख रस
ओर जीने लगा
तृष्णा पूर्ति जीवन
हो तल्लीन
होता जाता शुभ अशुभ के पार
पाप पुण्य के पार
मुक्त हुआ  शास्वत जीवन
दोहराता हूँ एक ही भाषा
हो घने संचित सुख मेरे
यान्त्रिक सुख
वितृष्णा का क्षणिक भराव
बार बार रीता भरता
पर संचित डराता हैं अब
निरंतर घूरता जाता
उसका बदलाव
भीतर वेदना देता हैं
सत्य मुखरित हुआ
कहता रहता
सुनो
संचित न भूत न भविष्य
 न ही वर्तमान
असल पाया कहां
संचित कब रहा
तुम्हारा।
छगन लाल गर्ग।





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