Sunday, 22 November 2015

संयमित रश्मिया।

संयमित रश्मि आभा मेरी
मानव हूँ मैं
ससीम दायरा हैं मेरा
निषेध की दशा नहीं
संध्या काल पसरा हुआ
ओर सन्नाटा इसका
घेरे हैं मुझे
पुष्प की खुली खुली
पाखूरी
सिमट रही अपनी पाखूरिया
पर होना होगा
संयमित
जीवन श्वास लेता हैं
विकसता जाता
मेरा संयम
अधिक फैलाव पाता
अंतर्मन की संगीत धारा
उकेरती हैं अनेको राग
तंरगित होते जाते
बजने लगती हैं
भीतरी वीणा
मेरा संयम
फैलाव हैं अन्नंत विराम का
ओर पहुँचना चाहता
संगीत लहरियो के साथ
पवन सुरभित झौको के साथ
सूर्य की असीम रश्मियो का
सहारा लेता
पहुँच पहुँच जाता
अन्नंत के वैभव मंडल मे
ओर पाता जाता
अपना अन्नंत विस्तार
निषेध नहीं हैं मेरा संयम
कि मुरझाया जीए जिन्दगी
पाता यह घनत्व
विस्तार का वैभव
जिसमें खिलते अन्नंत
भावों के सुकुमार पुष्प
झरते पराग कण
कि सुगंधित हो जाता
मेरा भीतरी चित
अनन्त गहराईयो से उठता
निषेध धुआँ बन
विलिन होता जाता
तृप्तियो की कन्दराओ मे
जहाँ अचेतन को विस्तार देता
पाता अपना स्व
कातरता नहीं हैं इसका लक्षण
सृजन का अंकुर फूटा हैं इसमें
जो करता जाता
नित
भावों का विस्तार
ओर गढता हैं सत्य के बिम्ब
हैं यह महा विलक्षण
प्रेम बीज से अंकुरित
प्रस्फूटित हुआ हैं जीवन मेरा।
छगन लाल गर्ग।

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