Sunday, 22 November 2015

गयात्मक हूँ मैं ।

गयात्मक हूँ मैं
धारणा देखो मुझे
क्यों दिखने लगता हूँ मैं
केवल पदार्थ
क्या ठीक होगा यह
नहीं हैं सत्य यह
हाँ अन्य पदार्थो सा
साँसारिक हूँ मैं
ठीक देखते हो
पर भीतर भीतर
चैतन्यता का
टिमटिमाता हैं दीया
प्रकृति के झंझावतो बीच
डरा सहमा जलता तो हैं
अंधेरो को अपनी
सामर्थ्य सीमा तक
हटाता तो हैं
धारणा सत्य तुम्हारा
टिमटिमाना मेरा
जूगनू सा मात्र
रोशनियो के पूण्ज
नहीं बसते मुझमें
पर रखता हूँ अंश ही सही
उजालो का
सही पहचानो तो मुझे
मेरी टिमटिमाहट भी
एक गति हैं
अंधेरे मिटाने की ओर
क्या यह कम हैं
कि चेतनता का संकेत
देता हूँ
गुजारिस हैं मेरी
देखो मुझे
हृदयहीन जड कहां हूँ मैं
स्वरूप बाहरी हूँ
पदार्थ आभासित
भीतर तह
आत्मसात हुए बिना
पाओगे कैसे
छोडो ग्रंथी पूर्वाग्रह
देखना होगा तुम्हें
पदार्थ समझे बिना ।
छगन लाल गर्ग।

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